विधवा बनाकर 1 साल से|| आश्रम में रह रही महिला का अचानक पति आ गया || और फिर||
प्रायश्चित और प्रेम की पुकार: एक हृदयस्पर्शी गाथा
पिछले तीन दिन से लगातार एक व्यक्ति जब अपनी पत्नी को ढूंढता है और वह उसे नहीं मिलती है, तो वह थक-हारकर गंगा के घाट पर एक पत्थर की सीढ़ी पर बैठ जाता है। उसके चेहरे पर थकान से ज्यादा ग्लानि के भाव थे। मन ही मन उन काली रातों और अपने द्वारा किए गए पाप को सोचकर उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। वह सोचने लगता है कि क्या ईश्वर उसे कभी माफ करेगा? तभी अचानक सामने से गुजर रहे श्रद्धालुओं के एक झुंड पर उसकी नजर पड़ती है। उस झुंड में ज्यादातर महिलाएं थीं जिन्होंने सफेद साड़ियां पहन रखी थीं और वे भजन गाते हुए आगे बढ़ रही थीं। उन्हीं के बीच उसे एक जाना-पहचाना चेहरा दिखता है—वह उसकी अपनी पत्नी सुमन थी।
उसे देखकर राजेश के गले से एक रुंधी हुई आवाज निकलती है। वह जोर से चिल्लाता है, “सुमन!” उस शोर-शराबे में भी वह मूक महिला जैसे अपने नाम की गूंज सुन लेती है। वह पीछे मुड़कर देखती है और जैसे ही सामने अपने पति राजेश को देखती है, उसकी आंखों में खुशी और दर्द का सैलाब उमड़ पड़ता है। वह भागती हुई आती है और राजेश को गले लगा लेती है। उसकी ममता और समर्पण का आलम यह था कि वह सबसे पहले झुककर राजेश के पैरों को छूती है और उनके नीचे की मिट्टी उठाकर अपनी सूनी मांग में भर लेती है। राजेश का कलेजा फट जाता है। वह फूट-फूटकर रोने लगता है और उसे एक ऐसी कड़वी सच्चाई बताने का निश्चय करता है जिसे सुनकर कोई भी स्त्री कांप जाए।
अतीत की धुंध: बिहार का वह छोटा सा घर
बिहार के मधुबनी जिले के एक छोटे से गाँव में राजेश का परिवार रहता था। राजेश स्वभाव से थोड़ा चंचल था, लेकिन वह एक कुशल जेसीबी (JCB) चालक था। दिन भर धूल और मिट्टी के बीच मशीन चलाकर वह जो कमाता, उससे उसका घर चलता था। उसकी पत्नी सुमन मूक (गूंगी) थी, लेकिन उसका दिल सोने जैसा था। वह बोल नहीं सकती थी, पर उसकी आँखें सब कुछ कह देती थीं। उनका एक छोटा सा बेटा था, जो अभी घुटनों के बल चलना सीखा था। सुमन अपने पति को भगवान मानती थी और हर सुबह काम पर जाने से पहले उसके पैर छूती थी।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुमन की छोटी बहन कोमल, जो अब १८-१९ साल की एक चंचल युवती हो चुकी थी, अक्सर उनके घर आती-जाती थी। कोमल अपनी बहन से बिल्कुल उलट थी—महत्वाकांक्षी और चालाक। धीरे-धीरे राजेश और कोमल के बीच अवैध/शारीरिक/संबंध विकसित होने लगे। राजेश कोमल की सुंदरता और उसकी बातों के मायाजाल में ऐसा फंसा कि उसे अपनी भोली-भाली पत्नी बोझ लगने लगी।
षड्यंत्र का ताना-बाना
कोमल ने राजेश के सामने शर्त रखी, “जीजाजी, अगर आपको मेरे साथ जीवन बिताना है, तो इस गूंगी को रास्ते से हटाना होगा। मैं किसी की सौतन बनकर नहीं रह सकती।” राजेश पहले तो डरा, लेकिन कोमल के अवैध/प्रेम के नशे ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। उन्होंने मिलकर एक योजना बनाई। राजेश ने घर में घोषणा की कि वे सभी हरिद्वार घूमने चलेंगे।
हरिद्वार पहुँचकर राजेश ने एक होटल लिया। एक शाम, जब गंगा आरती का समय था और हर की पौड़ी पर लाखों की भीड़ थी, राजेश सुमन और बच्चे को लेकर बाहर निकला। कोमल भी उनके साथ थी। भीड़ का फायदा उठाकर राजेश ने जानबूझकर सुमन का हाथ छोड़ दिया और कोमल के साथ दूसरी गली में गायब हो गया। सुमन, जो बोल नहीं सकती थी, चिल्ला भी न सकी। वह अपने बच्चे की तलाश में और पति को ढूंढने में उस भीड़ में खो गई।
राजेश और कोमल वापस होटल आए। उन्होंने बहाना बनाया कि सुमन खो गई है। १५ दिन तक उन्होंने ढूंढने का नाटक किया और फिर वापस गाँव लौट आए। गाँव वालों और सुमन के मायके वालों को राजेश ने रोते हुए बताया कि उसकी पत्नी भीड़ में गुम हो गई। कोमल ने भी झूठी गवाही दी कि उसने और जीजाजी ने आसमान-पाताल एक कर दिया पर दीदी नहीं मिली।
धोखे की शादी और कर्मों का फल
सुमन के खोने के ६ महीने बाद, राजेश ने फिर से एक नाटक रचा। उसने ससुराल वालों से कहा कि हरिद्वार पुलिस का फोन आया था और शायद सुमन मिल गई है। वह कोमल को अपने साथ दोबारा हरिद्वार ले गया। वहाँ उन्होंने १५ दिन तक अवैध/प्रेम/प्रसंग का आनंद लिया और वापस आकर कहा कि पुलिस को सुमन की लाश मिली है।
सुमन के माता-पिता टूट गए। तब राजेश ने अपना मुख्य कार्ड खेला— “माँ-बाप, मेरा बच्चा छोटा है, उसे अपनी मौसी का सहारा चाहिए। क्यों न कोमल की शादी मुझसे कर दी जाए?” कोमल ने भी मासूमियत का मुखौटा पहनकर हाँ कर दी। दोनों की शादी हो गई।
लेकिन पाप का घड़ा एक दिन भरता जरूर है। शादी के कुछ ही हफ़्तों बाद कोमल का असली चेहरा सामने आने लगा। उसे अब राजेश में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह घर में ही अपने दूसरे प्रेमियों/ से फोन पर बातें करती और उनके साथ बाहर जाने लगी। जब राजेश ने विरोध किया, तो कोमल ने दहाड़कर कहा, “चुप रहो! भूल गए तुमने अपनी पत्नी के साथ क्या किया था? अगर मैंने मुँह खोला तो तुम जेल की चक्की पीसोगे।” राजेश अंदर से टूट गया। उसे अब अपनी जेसीबी की आवाज में भी सुमन की चीखें सुनाई देने लगी थीं।
प्रायश्चित की राह
राजेश को एहसास हुआ कि उसने एक हीरे को छोड़कर पत्थर चुन लिया था। कोमल के अवैध/संबंधों ने उसके घर को नरक बना दिया था। एक रात उसने फैसला किया कि वह सुमन को खोजेगा, चाहे वह जीवित हो या मर चुकी हो। वह बिना किसी को बताए हरिद्वार चला गया।
तीन दिनों की कड़ी मेहनत के बाद उसे सुमन मिली। वह एक विधवा आश्रम की महिलाओं के साथ रह रही थी। आश्रम की महिलाओं ने बताया कि उन्हें यह मूक स्त्री घाट पर बदहवास मिली थी। वह सिर्फ अपने बच्चे के लिए इशारे करती और रोती थी। उन्होंने उसे सहारा दिया और वह उन्हीं के साथ सेवा कार्य में लग गई।
जब सुमन राजेश के गले लगी, तो राजेश ने उसे वहीं बिठाया और फूट-फूटकर अपनी सारी सच्चाई उगल दी। उसने बताया कि कैसे उसने और कोमल ने मिलकर उसे धोखा दिया था। यह सुनकर सुमन की आत्मा जैसे कांप उठी। वह जोर-जोर से विलाप करने लगी। उसके पास शब्द नहीं थे, लेकिन उसकी सिसकियाँ पूरे घाट पर गूंज रही थीं। आश्रम की बुजुर्ग महिलाओं ने राजेश को धिक्कारा, पर अंत में उन्होंने कहा, “जाओ, अब इस देवी की सेवा में अपना जीवन लगा दो। यही तुम्हारा सच्चा प्रायश्चित होगा।”
नया सवेरा
राजेश सुमन को लेकर जब अपने गाँव वापस लौटा, तो पूरे गाँव में हंगामा मच गया। कोमल को जब पता चला कि उसकी पोल खुल गई है, तो वह अपने एक प्रेमी/ राहुल के साथ घर का कीमती सामान लेकर फरार हो गई।
सुमन के मायके वालों को जब सच पता चला, तो उन्होंने राजेश को खूब खरी-खोटी सुनाई, लेकिन सुमन ने इशारों में सबको शांत कर दिया। उसने अपने पति को माफ कर दिया था। राजेश अब बदल चुका था। वह दिन-भर मेहनत करता और शाम को सुमन और अपने बच्चे के साथ समय बिताता। वह अब सुमन का ‘शब्द’ बन चुका था। कोमल का जीवन अब नरक बन गया था क्योंकि उसका नया पति (प्रेमी) उसे बात-बात पर मारता और प्रताड़ित करता था।
सीख: यह कहानी हमें चेतावनी देती है कि क्षणिक शारीरिक/आकर्षण और अवैध/प्रेम/प्रसंग के लिए कभी अपने परिवार और वफादार साथी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। कर्म का चक्र घूमकर वापस आता है, और जो हम दूसरों के साथ करते हैं, वही हमारे साथ भी होता है।
जय हिन्द, जय भारत।
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