ऑफिस जॉब के लिए सऊदी अरब गया था , वहां बकरियां चराने का काम मिला , फिर उसके साथ जो हुआ जानकर होश उड़

रेगिस्तान की कैद: सलीम की घर वापसी
भूमिका
क्या विदेश की चमकती दुनिया सच में वैसी ही होती है जैसी हमें यहां बैठकर दिखाई देती है? क्या पेट की भूख और जिम्मेदारियों का बोझ इंसान को इतना मजबूर कर सकता है कि वह अपनी आजादी ही गिरवी रख दे? भारत के हजारों नौजवान हर साल सुनहरे भविष्य का सपना लेकर एजेंटों के जाल में फंस जाते हैं, और सात समंदर पार ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां से लौटना नामुमकिन सा लगता है। यह कहानी एक ऐसे ही सीधे-साधे लड़के सलीम की है, जो एयर कंडीशन ऑफिस में काम करने का सपना लेकर निकला था, लेकिन उसकी किस्मत उसे तपते रेगिस्तान में बकरियों के बीच ले गई।
कस्बे से सपनों तक
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में सलीम रहता था। उम्र यही कोई 23-24 साल। घर के हालात बहुत नाजुक थे। पिता का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था। घर में बूढ़ी मां और एक विवाह योग्य बहन थी। सलीम अपने कस्बे में एक छोटी सी किराने की दुकान पर काम करता था, लेकिन वहां मिलने वाली तनख्वाह से घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था। बहन की शादी के लिए पैसे जोड़ने थे और घर की छत भी टपकने लगी थी।
सलीम अक्सर रातों को जागकर सोचता था कि वह ऐसा क्या करे जिससे उसके परिवार के दुख दूर हो जाएं। तभी उसकी मुलाकात रशीद भाई से हुई। रशीद खुद को मैनपावर एजेंट बताता था। उसने सलीम को विदेश के सपने दिखाने शुरू किए।
“यहां कब तक धक्के खाओगे? सऊदी अरब चलो। वहां बहुत पैसा है। मेरे पास एक बहुत अच्छी कंपनी का वीजा आया है। ऑफिस का काम है, एसी में बैठना है, सिर्फ फाइलों की देखरेख करनी है। तनख्वाह ₹400 और खाना-रहना मुफ्त।”
₹400 की रकम सलीम के लिए किसी खजाने से कम नहीं थी। उसने सोचा कि अगर वह दो-तीन साल वहां काम कर लेगा तो बहन की शादी धूमधाम से होगी और पक्का मकान भी बन जाएगा। मां पहले तो राजी नहीं हुईं, लेकिन सलीम ने समझाया, “मां, यह मौका बार-बार नहीं मिलता।”
सलीम ने मां के गहने गिरवी रखे और दोस्तों से उधार लेकर रशीद को वीजा और टिकट के लिए ₹1.5 लाख दिए। जिस दिन सलीम घर से निकल रहा था, पूरा मोहल्ला उसे छोड़ने आया था। सब कह रहे थे कि अब तो सलीम के दिन फिर जाएंगे। सलीम ने मां के पैर छुए, बहन को गले लगाया और वादा किया कि वह जल्द ही ढेर सारे पैसे भेजेगा। उसकी आंखों में सपनों की चमक थी। उसे क्या पता था कि वह जिस जहाज में बैठ रहा है, वह उसे सपनों की दुनिया में नहीं बल्कि एक भयानक हकीकत में ले जा रहा है।
सपनों का रेगिस्तान
सलीम रियाद एयरपोर्ट पर उतरा। वहां की चकाचौंध देखकर वह दंग रह गया। उसने सोचा, रशीद भाई सच कह रहे थे – यह देश तो सोने जैसा है। एयरपोर्ट के बाहर एक अरबी आदमी आया – अबू सालेह। पारंपरिक अरबी कपड़े, सख्त चेहरा। सलीम ने सलाम किया और ऑफिस के बारे में पूछा। अबू सालेह ने कोई जवाब नहीं दिया, बस इशारे से गाड़ी में बैठने को कहा।
गाड़ी शहर की तरफ नहीं, बल्कि बाहर रेगिस्तान की ओर दौड़ने लगी। सलीम ने सोचा, शायद ऑफिस किसी इंडस्ट्रियल एरिया में होगा। लेकिन धीरे-धीरे पक्की सड़क खत्म हो गई, कच्चा रास्ता शुरू हो गया। ऊंची इमारतें पीछे छूट गईं, चारों तरफ सिर्फ रेत ही रेत।
करीब 6 घंटे के सफर के बाद, सूरज डूबने वाला था। गाड़ी एक सुनसान जगह पर रुकी। वहां दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी। सिर्फ एक छोटा सा बाड़ा, सैकड़ों बकरियां और ऊंट, पास में लकड़ी और टीन की झोपड़ी। अबू सालेह ने सलीम का बैग बाहर फेंक दिया। पासपोर्ट मांगा, सलीम ने दे दिया। पासपोर्ट लेते ही अबू सालेह के चेहरे का भाव बदल गया।
“मैंने तुझे खरीदा है। तेरे एजेंट को पैसे दिए हैं। अब तू मेरा गुलाम है। तेरा पासपोर्ट मेरे पास है। यहां से भागने की कोशिश की तो इसी रेगिस्तान में दफना दूंगा।”
सलीम रोता रहा, गिड़गिड़ाता रहा। लेकिन रेगिस्तान की खामोशी में उसकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। अबू सालेह गाड़ी में बैठकर चला गया। धूल का गुबार उड़ता रह गया और सलीम वहीं रेत पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा।
कैद की जिंदगी
उस दिन से सलीम की जिंदगी नर्क बन गई। उसका काम था – सुबह सूरज निकलने से पहले उठना, सैकड़ों बकरियों और ऊंटों को रेगिस्तान में चराने ले जाना। धूप इतनी तेज कि चमड़ी जलने लगे, पैरों में छाले पड़ जाएं। पीने के लिए पानी भी सीमित था। खाने के नाम पर महीने में एक बार राशन – सिर्फ चावल, थोड़ा सा तेल, कभी-कभी दाल। सब्जी या मसाले का कोई नामोनिशान नहीं। चावल खत्म हो जाए, भूख ज्यादा लगे तो बकरियों का दूध पीकर गुजारा करना पड़ता।
शुरुआत में कच्चे दूध की महक से उल्टियां होती थीं, लेकिन पेट की आग ने सब सिखा दिया। बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह टूट चुका था। ना बिजली, ना मोबाइल नेटवर्क। फोन तो पहले दिन ही डिस्चार्ज होकर बंद हो गया था। उसे नहीं पता था कि दुनिया में क्या हो रहा है, कौन सा दिन है। वो बस सूरज उगने और डूबने का हिसाब रखता था।
रातें और भी डरावनी होती थीं। रेगिस्तान में रात को बहुत ठंड पड़ती थी। ओढ़ने के लिए एक पुराना, बदबूदार कंबल। लकड़ी के उस छोटे कमरे में सिकुड़ कर लेटा रहता। बाहर हवा की आवाजें आती थीं, जो किसी भूतिया फिल्म की तरह लगती थीं। मां की याद, बहन की चिंता – यही उसका सहारा था। कई बार मन में आया कि खुद को खत्म कर ले, लेकिन मां का चेहरा याद आ जाता और वह रुक जाता।
समय रेत की तरह फिसलता गया। 1 साल, 2 साल, 3 साल। सलीम की हालत आदिम मानव जैसी हो गई थी। बाल और दाढ़ी बढ़ गए, कपड़े फट गए, त्वचा धूप से काली पड़ गई। इंसान से ज्यादा जानवरों की भाषा समझने लगा। बकरियों से बातें करता, वही अब उसका परिवार थे।
मालिक अबू सालेह महीने-दो महीने में आता। राशन पटकता, बकरियों को गिनता। अगर एक भी बकरी कम या बीमार होती तो सलीम को बहुत मारता। सलीम ने मार खाना भी अपनी किस्मत मान लिया था। भागने की कोशिश छोड़ दी थी, क्योंकि चारों तरफ सैकड़ों किलोमीटर तक सिर्फ मौत का सन्नाटा था।
उम्मीद की किरण
चौथे साल की बात है। एक दिन रेगिस्तान में तेज आंधी आई। आंधी के बाद कुछ भटकते हुए भारतीय मजदूर वहां से गुजरे। वे एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के लोग थे, जो सड़क का सर्वे करने आए थे। उनका रास्ता भटक गया था, गाड़ी फंस गई थी। सलीम बकरियां चरा रहा था। दूर इंसानी आकृतियां देखीं। पहले लगा आंखों का धोखा है, लेकिन जब गाड़ी देखी तो दिल जोर से धड़कने लगा। पागलों की तरह दौड़ा।
मजदूरों ने देखा, एक जंगली जैसा आदमी उनकी तरफ दौड़ रहा है। डर गए। लेकिन जब सलीम ने पास आकर हिंदी में चिल्लाया, “भाई पानी भाई, मैं इंडियन हूं!” – वे रुक गए। सलीम उनके पैरों में गिर पड़ा। 4 साल बाद किसी इंसान को हिंदी बोलते सुना था। मजदूरों ने उसे उठाया, पानी पिलाया, बिस्किट खिलाए। सलीम ने रो-रो कर पूरी कहानी सुनाई। उसकी हालत देखकर मजदूरों की आंखों में आंसू आ गए।
मजदूरों ने बताया कि वे उसकी मदद करना चाहते हैं, लेकिन गाड़ी में नहीं ले जा सकते क्योंकि अगर मालिक या पुलिस ने देख लिया तो सब फंस जाएंगे। सऊदी अरब का कानून बहुत सख्त है। लेकिन उन्होंने सलीम को रास्ता बताया – करीब 50 कि.मी. दूर एक हाईवे है। रात के अंधेरे में वहां पहुंच जाओ, वहां से मक्का या जद्दा जाने वाली गाड़ियां मिल सकती हैं। एक पुराना मोबाइल फोन, सिम कार्ड और कुछ पैसे दिए। समझाया – पुलिस के पास जाकर सरेंडर करो, सिर्फ डिपोर्टेशन सेंटर ही भारत भेज सकता है। जेल हो सकती है, मार पड़ सकती है, लेकिन घर जाने का वही रास्ता है।
घर की ओर सफर
सलीम के अंदर जीने की नई उमंग जाग उठी। फैसला कर लिया – या तो घर जाएगा, या कोशिश करते हुए मर जाएगा। दो दिन तैयारी की, पानी की बोतलें जमा कीं, बकरियों को आखिरी बार प्यार किया। तीसरी रात, चांद पूरा निकला हुआ था। सलीम ने छोटा सा बैग उठाया और उस दिशा में चल पड़ा। सफर आसान नहीं था। रात के अंधेरे में रेगिस्तान में चलना मौत को दावत देने जैसा था – सांप, बिच्छू, रास्ता भटकने का डर।
चलता रहा। पैर जवाब दे रहे थे, लेकिन घर की याद धक्का दे रही थी। सुबह होते-होते थक चुका था, लेकिन दूर क्षितिज पर गाड़ियों की रोशनी देखी। हाईवे था। बची हुई ताकत बटोरी, सड़क किनारे पहुंचा, झाड़ियों में छिप गया। दिन भर वहीं छिपा रहा, रात होते ही सड़क पर आया। कई गाड़ियों को हाथ दिया, कोई नहीं रुका। हालत देखकर लोग डर रहे थे। आखिरकार एक ट्रक रुका। ड्राइवर पाकिस्तानी था। समझ गया कि यह कोई भगोड़ा मजदूर है। तरस खाकर लिफ्ट दी। जद्दा शहर के बाहरी इलाके में छोड़ दिया।
अब असली इम्तिहान शुरू हुआ। पुलिस को ढूंढना था। शहर में घूमता रहा। चकाचौंध भरी इमारतें, दुकानें, भीड़ देखकर सर चकरा रहा था। चार साल सन्नाटे में बिताए थे। डर लगा कि कहीं मालिक ना देख ले। एक मस्जिद के पास गया। नमाज पढ़ी, खुदा से मदद मांगी। कुछ भारतीय मिले। बताया – सीधा पुलिस स्टेशन जाओ, कहो कि भाग गया हूं, घर जाना चाहता हूं।
सलीम कांपते हुए पुलिस स्टेशन पहुंचा। अंदर गया, पुलिस वालों ने घेर लिया। कोई कागज नहीं, भाषा की दिक्कत। हथकड़ी लगाई, जेल में डाल दिया। जेल के दिन भी कम कष्टदायक नहीं थे। पूछताछ, मार-पिटाई – किसके लिए काम करता था? सलीम ने मालिक का नाम नहीं बताया, डर था कि वापस रेगिस्तान ले जाएगा। बस यही कहता रहा – इंडिया, इंडिया, वापस जाना है।
करीब 3 महीने जेल में रहने के बाद भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने संपर्क किया। मजदूरों ने शायद खबर पहुंचा दी थी या दूतावास की रूटीन चेक में नाम आ गया था। नागरिकता की पुष्टि हुई, इमरजेंसी सर्टिफिकेट बना। आखिरकार वह दिन आया जिसका सलीम ने हर पल इंतजार किया था। डिपोर्टेशन सेंटर से एयरपोर्ट ले जाया गया। एयर इंडिया का जहाज देखा तो जमीन पर झुक गया, मिट्टी को चूम लिया। जहाज में बैठते ही एयर होस्टेस ने हाथ जोड़कर नमस्ते कहा तो सलीम के आंसुओं का बांध टूट गया। पूरी उड़ान रोता रहा।
वापसी और चेतावनी
लखनऊ एयरपोर्ट पर उतरा, जेब बिल्कुल खाली थी। वही पुराने कपड़े जो मांग कर पहने थे। लेकिन सबसे बड़ी दौलत – आजादी। बस पकड़ कर कस्बे पहुंचा। गली में दाखिल हुआ, लोग पहचान नहीं पाए। बहुत कमजोर हो गया था। घर के दरवाजे पर पहुंचा, बहन ने दरवाजा खोला। एक पल देखती रही, फिर “भैया!” चिल्लाकर गले लग गई। मां लाठी टेकते हुए बाहर आई। बेटे को जिंदा देखकर मां की आंखों में जो खुशी थी, शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। पूरा घर रो रहा था। पड़ोस के लोग इकट्ठा हो गए। सलीम ने मां की गोद में सर रखकर वो सुकून पाया जो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिल सकता था।
बाद में पता चला कि जिस एजेंट रशीद ने उसे भेजा था, वो और भी कई लड़कों को ऐसे ही फंसा चुका था। सलीम के अंदर गुस्सा था, चाहता तो रशीद का गला दबा देता। लेकिन सलीम ने दूसरा रास्ता चुना। अगले दिन गांव के चौराहे पर गया। रशीद कुछ नए लड़कों को सऊदी अरब के सपने दिखा रहा था। सलीम पहुंचा, उसकी हालत देखकर सब चुप हो गए। सलीम ने रशीद को कुछ नहीं कहा। बस अपनी कमीज उतार दी। पीठ पर पड़े चाबुक के निशान, धूप से जली चमड़ी, पसलियां दिख रही थीं। लड़के सिहर उठे।
सलीम ने लड़कों से कहा,
“भाइयों, देखो! यह है वह एसी ऑफिस जिसका वादा रशीद भाई करते हैं। यह है वह ₹400 की तनख्वाह। मैं 4 साल रेगिस्तान में जानवर बनकर रहा हूं। मां की रोटी के लिए तरसा हूं। विदेश में कोई पेड़ पर पैसे नहीं उगते। वहां फंस गए तो लाश भी वापस नहीं आती।”
सलीम की कहानी और उसके शरीर के जख्मों ने रशीद का सारा कच्चा चिट्ठा खोल दिया। लड़कों ने रशीद को घेर लिया, पैसे वापस मांगे। रशीद को गांव छोड़कर भागना पड़ा। सलीम ने बदला नहीं लिया, बस सच बोलकर कई और जिंदगियों को बर्बाद होने से बचा लिया।
नई शुरुआत
आज सलीम अपने गांव में छोटी सी सब्जी की दुकान चलाता है। बहुत पैसे नहीं कमाता, लेकिन खुश है। शाम को परिवार के साथ बैठता है, मां के हाथ का खाना खाता है, खुली हवा में सांस लेता है। बहन की शादी भी हो गई, गांव वालों ने मिलकर मदद की। सलीम अक्सर युवाओं को समझाता है – कामयाबी का कोई शॉर्टकट नहीं होता। अपनी सूखी रोटी, परदेश के पुलाव से लाख गुना बेहतर है। सपने देखो, लेकिन खुली आंखों से। कभी किसी दलाल के भरोसे अपनी जिंदगी गिरवी मत रखना।
कहानी का संदेश
यह कहानी हमें सिखाती है कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं, लेकिन वहां सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं होता। हमारा घर, हमारा देश, हमारे लोग ही असली ताकत हैं। पैसा कमाना जरूरी है, लेकिन अपनी आजादी और आत्मसम्मान की कीमत पर नहीं। सलीम की यात्रा एक चेतावनी है उन सभी के लिए जो बिना जांच-पड़ताल एजेंटों के जाल में फंस जाते हैं। इंसान का जज्बा अगर मजबूत हो तो वह रेगिस्तान को भी पार कर सकता है।
अगर आपको सलीम की हिम्मत और संघर्ष दिल को छू गया हो, तो इस कहानी को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि कोई और सलीम किसी रेगिस्तान में ना फंस जाए। जागरूकता ही बचाव है।
जय हिंद।
News
मंदसौर | आखिर औरतें मर्दों से चाहती क्या है क्यों अपने पतियों के साथ ऐसा करती है ||
मंदसौर | आखिर औरतें मर्दों से चाहती क्या है क्यों अपने पतियों के साथ ऐसा करती है || मंदसौर हत्याकांड:…
उस रात मुझे टीटी के साथ समझौता करना पड़ा | मेरी मजबूरी का फायदा उठाया | Emotional True Story”
उस रात मुझे टीटी के साथ समझौता करना पड़ा 😭 | मेरी मजबूरी का फायदा उठाया | ट्रेन का वह…
दो सगे बेटों ने अपने पिता के साथ कर दिया बड़ा कां#ड/असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/
दो सगे बेटों ने अपने पिता के साथ कर दिया बड़ा कां#ड/असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/ लोन…
Police के रवैये से दुखी पीड़िता ने जान दे दी |Chitrakoot में Dalit लड़की का Gang Rape
Police के रवैये से दुखी पीड़िता ने जान दे दी |Chitrakoot में Dalit लड़की का Gang Rape न्याय की प्रतीक्षा…
Asha Bhosle Funeral: आशा भोसले के कितने बच्चे थे,बेटा बहू क्या करते है |Kids Details,Son,Daughter..
Asha Bhosle Funeral: आशा भोसले के कितने बच्चे थे,बेटा बहू क्या करते है |Kids Details,Son,Daughter.. आशा भोसले: सुरों की मलिका…
सरकारी आफिसर कि खूबसूरत बीवी ने यह क्या किया | Motivational story
सरकारी आफिसर कि खूबसूरत बीवी ने यह क्या किया | Motivational story वैवाहिक सत्य और एक /मर्यादित/ समझौता अध्याय १:…
End of content
No more pages to load






