पति के सारे रुपए खर्च करने के बाद तलाक दे दिया, पति ने होशियारी दिखाई.. फिर जो हुआ

ख्वाहिशों का बोझ – पूनम और रोहित की कहानी”
पहला भाग: बचपन की जिद और शादी के बाद की उम्मीदें
पूनम अपने मायके की इकलौती बेटी थी। बचपन से ही उसकी हर जिद पूरी होती थी। पिता के पास शहर में दो दुकानें थीं, मां घर संभालती थी। पूनम को कभी किसी चीज की कमी नहीं रही। धीरे-धीरे उसके स्वभाव में एक कड़वाहट आ गई, एक ऐसा रवैया जिसमें वह दूसरों को छोटा समझने लगी थी।
फिर उसकी शादी रोहित से हुई। रोहित एक छोटी कंपनी में अकाउंटेंट था। तनख्वाह ठीक-ठाक थी, लेकिन पूनम की आदतों के सामने वह कम पड़ जाती थी। शादी के पहले महीने से ही पूनम ने अपनी मांगें शुरू कर दीं – नए कपड़े, महंगे सौंदर्य प्रसाधन, ब्रांडेड चीजें, सब कुछ चाहिए था। रोहित चुपचाप सब देता रहा, क्योंकि उसे लगता था पत्नी को खुश रखना ही पति का धर्म है।
जो पैसे बचाने थे, वह खर्च होने लगे। जो भविष्य के लिए रखे थे, वह आज में खत्म होने लगे। लेकिन पूनम को कोई फर्क नहीं पड़ता था।
दूसरा भाग: बढ़ती मांगें और टूटता परिवार
छह महीने बाद पूनम ने कहा, “मुझे नई कार चाहिए। रोज ऑटो में बैठकर मायके जाना शोभा नहीं देता।”
रोहित ने समझाया, “अभी इतनी बचत नहीं है। थोड़ा इंतजार करो, लोन लेकर ले लेंगे।”
पूनम का चेहरा तमतमा गया, “तुम्हारी औकात ही क्या है? मेरे पिता ने मुझे तुम्हें दिया, यह तुम्हारी किस्मत थी।”
रोहित ने कुछ नहीं कहा। उसने दो महीने बाद अपनी पुरानी गाड़ी बेचकर और लोन लेकर पूनम के लिए कार खरीद दी। पूनम खुश हुई, लेकिन सिर्फ दो हफ्ते के लिए। फिर नई मांगें आ गईं – हर महीने पार्लर जाना, कपड़ों का बजट बढ़ाना।
रोहित के माता-पिता गांव में रहते थे। वे बूढ़े थे और उन्हें हर महीने थोड़े पैसे भेजने होते थे। एक दिन रोहित ने हिम्मत करके पूनम से कहा, “मुझे अपने मां-बाप को भी पैसे भेजने होते हैं। हम थोड़ा खर्च कम कर सकते हैं क्या?”
पूनम हंस पड़ी, “तुम्हारे मां-बाप गांव में रहते हैं ना, वहां तो फ्री में सब मिलता है। मेरी जरूरतें ज्यादा जरूरी हैं।”
रोहित का दिल टूट गया। उसने अपने माता-पिता को कम पैसे भेजना शुरू कर दिया। उसकी मां ने फोन पर पूछा, तो उसने बहाना बना दिया।
तीसरा भाग: तलाक की मांग और अकेलापन
एक साल और बीत गया। रोहित की सारी जमा पूंजी खत्म हो चुकी थी। बहन की शादी के लिए जो पैसे रखे थे, वह भी पूनम के शौक पूरे करने में चले गए। अब वह कर्ज में डूबता जा रहा था।
फिर एक दिन पूनम ने बम फोड़ा, “रोहित, मुझे तुमसे तलाक चाहिए।”
रोहित स्तब्ध रह गया, “क्यों? मैंने तुम्हारी हर बात मानी है।”
पूनम ने ठंडे स्वर में कहा, “यही तो दिक्कत है। तुम्हें कोई दम नहीं है। मेरे पिता कहते हैं कि तुम कमजोर आदमी हो। मुझे तुम्हारे जैसे बेजान इंसान के साथ नहीं रहना।”
रोहित ने हाथ जोड़कर कहा, “पूनम प्लीज, हम सब ठीक कर सकते हैं।”
लेकिन पूनम अड़ गई। उसने अपने पिता को बुलाया, घर में तूफान खड़ा कर दिया। पूनम के पिता ने रोहित को धमकाया – “अगर तलाक नहीं दिया तो पुलिस में केस कर देंगे।”
डेढ़ महीने की लंबी लड़ाई के बाद रोहित ने हार मान ली। तलाक हो गया। पूनम खुशी-खुशी अपने मायके चली गई, सारी महंगी चीजों के साथ। रोहित अकेला रह गया – ना पैसे, ना सामान, ना उम्मीद।
चौथा भाग: बदलाव की शुरुआत
उस रात जब रोहित अपने खाली फ्लैट में बैठा था, उसके दिमाग में एक विचार आया। उसने अपनी पुरानी फाइलें निकालीं, कागजात देखने लगा। उसके चेहरे पर पहली बार एक अजीब सी मुस्कान आई – जो अंत में सब कुछ बदलने वाला था।
तलाक के बाद पूनम का जीवन पहले जैसा ही चलने लगा। मायके में किसी चीज की कमी नहीं थी। दिनचर्या वही – देर से उठना, सहेलियों के साथ घूमना, खरीदारी करना। उसे लगता था कि रोहित से छुटकारा पाकर उसने सही फैसला लिया है।
एक दिन उसकी सहेली नेहा ने पूछा, “तू खुश है?”
पूनम ने जवाब दिया, “बिल्कुल। उस कमजोर इंसान के साथ रहकर मेरी जिंदगी बर्बाद हो रही थी। अब मैं आजाद हूं।”
लेकिन आजादी के साथ सवाल भी आने लगे थे। पूनम की उम्र अब 30 के करीब थी। समाज में लोग बातें बनाने लगे थे। उसके पिता को चिंता होने लगी – “पूनम, अब दूसरी शादी के बारे में सोचो।”
पूनम ने हर रिश्ते में कोई ना कोई कमी निकाल दी – किसी की तनख्वाह कम, किसी की शक्ल पसंद नहीं, किसी का घर छोटा। उसकी मांगें आसमान छू रही थीं।
पांचवां भाग: रोहित की नई उड़ान
इधर रोहित की जिंदगी बदल रही थी। तलाक के बाद वह शांत हो गया था, लेकिन हार नहीं मानी थी। उसने अपनी नौकरी में पूरा ध्यान लगाना शुरू किया। ओवरटाइम, एक्स्ट्रा प्रोजेक्ट – धीरे-धीरे कर्ज चुकाने शुरू किए। छह महीने बाद रोहित को प्रमोशन मिला, तनख्वाह बढ़ गई। उसने अपने माता-पिता को फिर से पैसे भेजना शुरू किया और उनसे माफी मांगी।
एक दिन रोहित के ऑफिस में बड़ी मीटिंग थी। शहर के कई बिजनेसमैन आए थे। उसी मीटिंग में पूनम के पिता भी थे। जब उन्होंने रोहित को देखा, पहले तो पहचान नहीं पाए। फिर ध्यान से देखा तो चौंक गए।
मीटिंग के बाद पूनम के पिता ने रोहित से पूछा, “तुम यहां क्या कर रहे हो?”
रोहित ने विनम्रता से जवाब दिया, “मैं यहां असिस्टेंट मैनेजर हूं। कंपनी ने हाल ही में प्रमोट किया है।”
पूनम के पिता हैरान रह गए। जिस आदमी को वह कमजोर समझते थे, वह अब अच्छी पोजीशन पर था। घर आकर उन्होंने यह बात पूनम को बताई। पहले तो पूनम को यकीन नहीं हुआ, फिर सोचा शायद छोटा प्रमोशन होगा। लेकिन अगले कुछ हफ्तों में पूनम को अलग-अलग जगहों से रोहित के बारे में सुनने को मिला – किसी ने बताया महंगे रेस्टोरेंट में देखा, किसी ने कहा नई गाड़ी खरीदी है।
पूनम के मन में हलचल मचने लगी। वह सोचने लगी – शायद उसने जल्दबाजी में फैसला लिया था। रोहित तो अब अच्छी स्थिति में है, अगर वह उसके साथ रहती तो आज उसे भी यह सब मिलता।
छठा भाग: पछतावे की रात
एक शाम पूनम अपनी सहेली के साथ मॉल में थी। तभी उसने रोहित को देखा – अकेला नहीं था, अपनी मां के साथ था। रोहित अपनी मां के लिए कपड़े खरीद रहा था, दोनों हंस-हंस कर बातें कर रहे थे। पूनम का दिल जलने लगा। उसे याद आया कि उसने कैसे रोहित की मां के बारे में बुरा बोला था, पैसे भेजने से रोका था। अब रोहित अपनी मां को वह सब दे रहा था जो पूनम ने कभी नहीं चाहा था।
घर आकर पूनम चुपचाप अपने कमरे में बैठ गई। पहली बार उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। लेकिन अब क्या हो सकता था? तलाक हो चुका था, रोहित आगे बढ़ चुका था।
सातवां भाग: एक आखिरी कोशिश
पूनम ने सोचा – शायद वह रोहित से बात कर सकती है, शायद दोबारा मौका मिल सकता है। उसने रोहित का नंबर निकाला, तीन बार डायल किया, तीनों बार काट दिया। हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर अगले दिन उसने आखिरकार रोहित को मैसेज भेजा – “हाय, कैसे हो?”
रोहित का जवाब तीन घंटे बाद आया – “ठीक।”
पूनम समझ गई कि अब रोहित पहले वाला नहीं रहा था। वह बेचैन हो गई। अगली सुबह फिर से मैसेज भेजा – “मुझे तुमसे मिलना है, जरूरी बात करनी है।”
रोहित ने शाम को जवाब दिया – “क्यों?”
पूनम ने झूठ बोला – “कुछ कागजात के बारे में बात करनी है।”
रोहित ने एक कैफे का पता भेजा, अगले दिन शाम 5 बजे का समय दिया।
पूनम ने खास तैयारी की – महंगी साड़ी, मेकअप। उसे लग रहा था कि रोहित उसे देखकर फिर से पिघल जाएगा।
आठवां भाग: सच का सामना
कैफे में पहुंचकर पूनम ने देखा – रोहित पहले से ही बैठा था, साधारण कपड़ों में, चेहरे पर आत्मविश्वास।
“बैठो,” रोहित ने बिना मुस्कुराए कहा।
पूनम बैठ गई, कॉफी ऑर्डर की। “तुम कैसे हो?”
“अच्छा हूं। कौन से कागजात की बात करनी थी?”
पूनम ने सच कहने का फैसला किया, “दरअसल, मुझे तुमसे बात करनी थी। सुना तुम्हारी जिंदगी अच्छी चल रही है।”
“हां, भगवान का शुक्र है।”
“देखो रोहित, शायद हमने जल्दबाजी में फैसला लिया था। हम फिर से कोशिश कर सकते हैं।”
रोहित की आंखों में एक पल के लिए हैरानी आई, फिर वह शांत हो गया। “पूनम, तुम्हें क्या लगता है कि मैं क्यों मान जाऊंगा?”
“हम पति-पत्नी थे। गलती से तुम्हें समझ नहीं पाई। अब एहसास हुआ है।”
रोहित हंसा, लेकिन उसकी हंसी में कड़वाहट थी। “एहसास या फिर तुम्हें एहसास हुआ कि अब मेरे पास पैसे हैं?”
पूनम का चेहरा लाल हो गया। “ऐसी बात नहीं है।”
“तो कैसी बात है?”
“जब मैं तुम्हारी हर बात मान रहा था, तुम्हारे हर शौक पूरे कर रहा था, तब तुमने कहा कि मुझ में दम नहीं है। मेरे मां-बाप को किस नजर से देखा था, भूल गई?”
पूनम की आंखों में आंसू आ गए। “मुझसे गलती हो गई, माफ कर दो।”
रोहित ने बैग से एक लिफाफा निकाला, टेबल पर रखा। “यह देखो।”
पूनम ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला। उसमें कुछ कागजात थे – हर महीने की डिटेल, हर खरीदारी का बिल, हर लोन की रसीद।
“तुमने यह सब क्यों रखा?”
“क्योंकि मुझे पता था एक दिन तुम्हें इसकी जरूरत पड़ेगी। तलाक के समय मैंने कुछ नहीं मांगा, लेकिन कानूनी तौर पर तुम मुझे यह सब वापस कर सकती हो।”
पूनम घबरा गई, “मेरे पास इतने पैसे कहां हैं?”
“यह तुम्हारी समस्या है। मैं कोर्ट नहीं जाना चाहता, लेकिन अगर तुम फिर से मेरी जिंदगी में आने की कोशिश करोगी, तो मुझे यह कदम उठाना पड़ेगा।”
पूनम रोने लगी, “प्लीज रोहित, ऐसा मत करो।”
रोहित उठ खड़ा हुआ, “पूनम, तुमने मुझे सिर्फ एटीएम समझा। जब पैसे खत्म हुए, तो मुझे फेंक दिया। अब मैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से जी रहा हूं। मेरी मां खुश है, मेरे पिता खुश हैं और मैं खुश हूं। तुम भी अपनी जिंदगी में खुश रहो।”
यह कहकर रोहित चला गया। पूनम वहीं बैठी रोती रही। उसे समझ आ गया था कि रोहित कमजोर नहीं बल्कि समझदार था।
अंतिम भाग: पछतावा और नई शुरुआत
घर जाकर पूनम ने अपने पिता को यह बात बताई। वह भी चुप हो गए। उन्हें समझ आ गया कि रोहित कमजोर नहीं, समझदार था। पूनम ने उस दिन के बाद कभी रोहित से संपर्क नहीं किया। उसकी जिंदगी वैसी ही रह गई – खोखली और अकेली। उसे अपनी गलती का एहसास तो हो गया था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।
रोहित आगे बढ़ चुका था और पीछे मुड़कर देखने का कोई इरादा नहीं था। उसने अपनी जिंदगी दोबारा संवार ली थी। लेकिन जिस पूनम को खूबसूरती और पिता की दौलत का घमंड था, वह अब पूरी तरह टूट चुकी थी।
सीख और संदेश
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