पुनर्जन्म | 4 साल के बच्चे ने बताई अपने पिछले जन्म की कहानी | 4 साल का बच्चा निकला आर्मी ऑफिसर

पुनर्जन्म – एक सैनिक की अधूरी प्रतिज्ञा
हरियाणा के एक छोटे से गांव में किसान रामपाल के घर बरसों बाद किलकारी गूंजी थी। पंडित जी ने कहा, “लड़का देवी का अंश है, इसका नाम देवांश रखो।” साधारण किसान परिवार में जन्मा देवांश बचपन से ही असाधारण था। उसकी आदतें, उसका व्यवहार गांव के बाकी बच्चों से बिल्कुल अलग था। जिस उम्र में बच्चे मिट्टी में खेलते, देवांश सुबह 4 बजे उठकर खेतों की मेड़ों पर दौड़ लगाता, जैसे कोई फौजी ट्रेनिंग कर रहा हो।
तीन साल की उम्र में उसने ऐसी जिद पकड़ी कि रामपाल को शहर जाकर उसके लिए आर्मी ऑफिसर की वर्दी सिलवानी पड़ी। देवांश लकड़ी के फट्टों से बंदूकें बनाता और अजीब सी भाषा में दुश्मनों पर चिल्लाता। रात को उसे अजीब सपने आते, जिनमें एक खूबसूरत औरत रोते हुए उसकी कलाई पर तावीज बांधती और कहती, “वापस जरूर आना।” फिर युद्ध, गोलियां, बम धमाका और तीन गोलियां उसके सीने में। हर बार सपना वहीं खत्म होता।
पांच साल का हुआ तो एक दिन घर के आंगन में बैठा जोर-जोर से रो रहा था। रामपाल ने गोद में उठाते हुए पूछा, “क्या हुआ बेटा?” देवांश ने हाथ झटक दिए, “आप मेरे पिता नहीं हो। मैं यहां कैसे आया हूं? मेरी बीवी और मेरे बच्चे कहां हैं?” रामपाल और उसकी पत्नी के होश उड़ गए। गांव में बात फैल गई कि रामपाल का बेटा पागल हो गया है। मंदिर-मस्जिद, तावीज, झाड़-फूंक, सब करवाया लेकिन देवांश की हालत बिगड़ती गई। वह बार-बार दोहराता, “मेरा नाम देवांश नहीं है, मैं कर्नल रघुवीर हूं। मेरी बीवी प्रेग्नेंट है, मुझे उसके पास जाना है।”
रामपाल ने गांव के प्रधान से मदद मांगी। प्रधान ने दिल्ली पुलिस में अपनी रिश्तेदार एसपी कणिका को फोन किया। कणिका ने दिल्ली के उस पते की जांच की, जो देवांश बार-बार दोहराता था। अगले दिन खबर आई – “उस पते पर सचमुच कर्नल रघुवीर नाम का आर्मी ऑफिसर रहता था, जो चार साल पहले ऑपरेशन थंडर के दौरान शहीद हो गया था। उसकी पत्नी प्रिया है और एक चार साल का बेटा भी।”
प्रधान, रामपाल, देवांश और एसपी कणिका दिल्ली पहुंचे। देवांश ने रास्ता दिखाया, बिना झिझक अपने पुराने घर के गेट पर आकर रुक गया। नेमप्लेट पर लिखा था – “कर्नल रघुवीर सिंह (शहीद)”। दरवाजा प्रिया ने खोला, सफेद साड़ी पहने, आंखों में उदासी। देवांश ने पहचान लिया, “प्रिया, तुमने यह सफेद साड़ी क्यों पहन रखी है? मैं तो जिंदा हूं, मैं वापस आ गया।”
प्रिया हक्का-बक्का रह गई। कणिका ने उसे पूरी बात समझाई। देवांश ने घर के अंदर दीवार पर टंगी रघुवीर की तस्वीर देखी, माला उतार फेंकी, “यह मेरी फोटो पर माला किसने लगाई? मैं तो जिंदा हूं।” अंदर कमरे में एक बच्चा खेल रहा था, देवांश दौड़कर उसे गले लगा लिया, “मेरा बेटा!”
प्रिया ने देवांश से सवाल किए, “अगर तुम रघुवीर हो तो बताओ, हमारी पहली मुलाकात कहां हुई थी?” देवांश ने तुरंत जवाब दिया, “आर्मी कैंटीन में, तुमने कॉफी गिरा दी थी मेरी वर्दी पर।” “घर में क्या बदलाव किए?” – “स्टडी को स्टोर रूम बना दिया, बेडरूम की दीवार का रंग नीला करवा दिया। मुझे नीला रंग पसंद नहीं था।” प्रिया फूट-फूटकर रोने लगी।
कणिका ने आर्मी हेडक्वार्टर से ऑपरेशन थंडर की टीम के चार जीवित जवान बुलवाए। देवांश ने सबको नाम से पुकारा, उनके निजी राज़ और यादें साझा कीं, जो सिर्फ उनके और रघुवीर के बीच थी। जवानों ने उसे सैल्यूट किया, “जय हिंद सर!”
अब सबको यकीन हो गया था – देवांश ही रघुवीर का पुनर्जन्म है। रामपाल और उसकी पत्नी अपने बेटे को खोना नहीं चाहते थे, प्रिया अपने पति को फिर से जाने नहीं देना चाहती थी। फैसला हुआ कि रामपाल का परिवार दिल्ली में प्रिया के घर के पास रहेगा। देवांश अपने बेटे के साथ खेलता, दोनों एक ही स्कूल जाते। यह रिश्ता दुनिया के लिए अजीब था, लेकिन सबने स्वीकार कर लिया।
समय बीता। जैसे-जैसे देवांश बड़ा होता गया, उसकी पिछले जन्म की यादें धुंधली पड़ने लगीं। वह प्रिया को “आंटी” कहने लगा, अपने बेटे को सबसे अच्छा दोस्त मानने लगा। आठ साल की उम्र में उसे अपने पिछले जन्म के बारे में कुछ भी याद नहीं रहा। वह एक आम बच्चा बन गया, जिसकी आंखों में अब रघुवीर की नहीं, बल्कि अपने सपने थे।
रामपाल, उसकी पत्नी और देवांश गांव लौट गए। प्रिया अकेली रह गई, लेकिन मन से अब भी रघुवीर के साथ जुड़ी थी। दीवारों पर उसकी मुस्कुराती तस्वीरें, अलमारी में सहेजी चीजें और सबसे बड़ी निशानी – उसका बेटा, जिसमें प्रिया हर दिन रघुवीर का अक्स देखती थी। वह बच्चे की आंखों में झांकती तो उसे लगता, जैसे रघुवीर अब भी यहीं है।
समाप्त
यह कहानी पुनर्जन्म, अधूरी प्रतिज्ञा और रिश्तों की गहराई को छूती है। इसमें विश्वास, विज्ञान, प्यार और परिवार सबका मिश्रण है।
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