बीमार माँ-बाप को बेटे ने अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर छोड़ आया, पर भगवान के घर देर था, अंधेर नहीं

अर्जुन, दादी और परिवार की पूरी कहानी – समाज का आईना
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में रहने वाले रामेश्वर प्रसाद और सावित्री देवी अब उम्र के उस पड़ाव पर थे, जहां शरीर कमजोर हो चला था, आंखों की रोशनी कम हो रही थी और हर कदम पर सहारे की जरूरत थी। उनके साथ उनका बेटा संजय, बहू पूजा और इकलौता पोता अर्जुन रहता था। अर्जुन विदेश में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहा था। जब तक अर्जुन गांव में था, घर में खुशियों का माहौल रहता था। दादा-दादी का लाडला अर्जुन उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखता, उनकी दवाइयां लाता, फल खरीदता, रात को उनकी कहानियां सुनता और माता-पिता को समझाता कि दादा-दादी का ध्यान रखें।
लेकिन वक्त ने करवट ली। जैसे ही अर्जुन विदेश गया, घर की तस्वीर बदल गई। रामेश्वर जी और सावित्री देवी की हालत बिगड़ने लगी, बीमारियां बढ़ीं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी तकलीफ बीमारी नहीं थी, बल्कि बेटे-बहू का बेरहम व्यवहार था। संजय अपने काम में डूबा रहता, पूजा को सिर्फ अपने आराम से मतलब था। वे दोनों बुजुर्ग अपने ही घर में पराए हो गए थे। पूजा उन्हें बासी खाना देती, संजय उनकी शिकायत पर गुस्सा करता—“अब तुम लोग क्या काम करते हो? जो हर बार ताजा खाना चाहिए। जो मिल रहा है, चुपचाप खा लो।”
रामेश्वर जी और सावित्री देवी अपने कमरे में जाकर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर रोते, पुराने दिन याद करते। अर्जुन के जाने के बाद उनकी जिंदगी और भी सूनी हो गई। अर्जुन विदेश में था, तो संजय और पूजा उन्हें बोझ समझने लगे। अगर दवाई चाहिए होती तो पूजा ताने मारती, “हर बार दवाई चाहिए, पता नहीं कितना खर्च करवाओगे।” अगर सावित्री देवी कुछ कहती तो संजय की बेरुखी उन्हें चुप करा देती।
एक दिन रामेश्वर जी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। सावित्री देवी कांपते पैरों से संजय के पास गई, “बेटा, तेरे पिताजी की हालत बहुत खराब है, अस्पताल ले चलो।” संजय गुस्से से बोला, “मुझे बस यही काम बचा है क्या? दिनभर काम करता हूं, थक जाता हूं और तुम लोग नई मुसीबत ले आते हो। अस्पताल ले जाऊंगा तो मेरा पूरा दिन बर्बाद हो जाएगा। जो करना है खुद कर लो।” वह बाहर चला गया, ना पिता का हाल पूछा, ना मदद दी।
सावित्री देवी ने हार नहीं मानी। अपने कांपते हाथों से रामेश्वर जी को सहारा दिया, “चलो, मैं तुम्हें खुद अस्पताल ले जाऊंगी।” अपनी पुरानी साड़ी के पल्लू में बांधे पैसे से ऑटो लिया और सरकारी अस्पताल पहुंची। डॉक्टर ने कहा, “बीपी बहुत बढ़ गया है, शुगर भी कंट्रोल से बाहर है, तुरंत दवाइयां शुरू करनी होंगी।” दवाइयां लेकर घर लौटते वक्त तेज बारिश शुरू हो गई। ऑटो वाला कीचड़ भरी गलियों में आगे नहीं गया, दोनों को उतरना पड़ा। सावित्री देवी ने रामेश्वर जी का हाथ थामा, साड़ी का पल्लू सिर पर रखा, कीचड़ भरे रास्ते पर धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ने लगी।
घर पहुंचते ही संजय और पूजा ने ताने मारे, “देखो, इन लोगों ने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी। गांव वाले देखेंगे तो क्या कहेंगे?” संजय चिल्लाया, “यह उम्र है बाहर घूमने की? बारिश में ऐसे चलने की? कुछ तो शर्म करो।” सावित्री देवी ने रोते हुए कहा, “बेटा, तेरे पिताजी की तबीयत खराब थी, तूने अस्पताल ले जाने से मना कर दिया था। बारिश में अगर मैं उन्हें ना संभालती तो वे गिर जाते।” संजय का दिल ना पसीजा।
पूजा ने कहा, “इनका कुछ करना पड़ेगा, हर बार हमें शर्मिंदा करते हैं।” संजय ने खतरनाक योजना बनाई—“कल मैं इनका पक्का इंतजाम कर दूंगा।” अगले दिन वह दोनों को प्यार से शहर के बड़े अस्पताल ले जाने का बहाना करता है। दोनों को स्टेशन ले जाकर दिल्ली की ट्रेन में बिठाता है। दिल्ली पहुंचकर अस्पताल के बाहर चबूतरे पर बिठाकर बोलता है, “मैं डॉक्टर से बात करके आता हूं।” और हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।
रामेश्वर जी और सावित्री देवी घंटों इंतजार करते हैं, लेकिन संजय नहीं आता। रात हो जाती है, डर बैठ जाता है। सावित्री देवी कांपती आवाज में कहती हैं, “लगता है हमारा बेटा हमें छोड़कर चला गया।” दोनों फूट-फूट कर रोते हैं, उनके पास ना पैसे हैं, ना कोई सहारा। सावित्री देवी हार नहीं मानतीं, होटल मालिक से काम मांगती हैं—“बर्तन मांझ दूंगी, झाड़ू-पोछा कर दूंगी, बदले में सिर्फ खाना दे देना।” मालिक दयालु था, काम दे देता है। अब सावित्री देवी होटल में काम करती, रामेश्वर जी कोने में बैठे रहते। रात को होटल के फर्श पर पतली चादर बिछाकर सोते, अपने बेटे-बहू को कोसते, अर्जुन को याद करते।
इधर अर्जुन विदेश में अपनी पढ़ाई पूरी करके माता-पिता को फोन करता है—“मम्मी-पापा, मेरा कोर्स खत्म हो गया है, मैं इंडिया आ रहा हूं। पहले दादा-दादी से बात कराओ।” संजय झूठ बोलता है—“वे तीर्थ यात्रा पर हैं, वहां नेटवर्क नहीं है।” अर्जुन इंडिया आता है, दिल्ली के अस्पताल में इंटरव्यू देता, भूख लगती है, पास के होटल में जाता है। वहां फर्श पर पोछा लगाती बुजुर्ग महिला को देखता है, शक्ल जानी-पहचानी लगती है। पास जाकर देखता है—वो उसकी दादी सावित्री देवी हैं।
“दादी!”—अर्जुन की आवाज सुनकर सावित्री देवी उठती हैं, अर्जुन से लिपट जाती हैं, दोनों फूट-फूट कर रोते हैं। रामेश्वर जी भी पास ही बैठे थे। अर्जुन उनके पैर छूता है—“दादाजी आप यहां कैसे?” दोनों सारी कहानी सुनाते हैं—कैसे संजय इलाज के बहाने दिल्ली लाया और छोड़ गया, कैसे वे बेसहारा हो गए, कैसे होटल में काम करके गुजारा कर रहे हैं।
अर्जुन का खून खोल उठता है। वह दादा-दादी को गले लगाता है—“अब मैं हूं आपके साथ।” वह दिल्ली में किराए का घर लेता है, दो नौकर रखता है, दादा-दादी की सेवा करता है। फिर गांव लौटता है। संजय और पूजा उसे देखकर खुश होते हैं। अर्जुन कहता है, “मम्मी-पापा, मुझे विदेश में अच्छी नौकरी मिली है, लेकिन मैं आपको अकेले नहीं छोड़ सकता, आप मेरे साथ चलो।” दोनों सामान पैक करते हैं, दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचते हैं। अर्जुन कहता है, “आप यहां थोड़ा इंतजार करो, मैं टिकट कंफर्म करवा कर आता हूं।” वह दूसरे गेट से निकलकर दादा-दादी के पास चला जाता है।
संजय और पूजा घंटों इंतजार करते हैं, अर्जुन नहीं आता, फोन स्विच ऑफ। उन्हें समझ आता है—अर्जुन उन्हें छोड़कर चला गया। वे बेसहारा एयरपोर्ट पर बैठे रोते हैं। अर्जुन दादा-दादी को लेकर एयरपोर्ट पहुंचता है, संजय और पूजा से कहता है—“जो आपने दादाजी-दादी के साथ किया, वही मैंने आपके साथ किया। अब आपको उनका दर्द समझ आया?” संजय शर्मिंदा हो जाता है, माता-पिता के पैरों में गिरकर माफी मांगता है। रामेश्वर जी और सावित्री देवी उसे माफ कर देते हैं—क्योंकि माता-पिता अपनी औलाद की खुशी के लिए हर दुख भूल जाते हैं।
आखिरकार पूरा परिवार फिर से एक हो जाता है। अर्जुन ने अपने माता-पिता को सबक सिखाया और दादा-दादी को वह सम्मान दिलाया जिसके वे हकदार थे।
यह कहानी हमें सिखाती है—अपनों का सम्मान करो, वरना एक दिन आपको भी अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ सकता है।
आपकी राय क्या है? अर्जुन ने सही किया? संजय और पूजा को क्या सजा मिलनी चाहिए थी? क्या रामेश्वर जी और सावित्री देवी का दर्द आज के समाज की सच्चाई है?
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