“बूढ़ी माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आया बेटा… लेकिन अगले ही दिन जब आश्रम का मालिक घर आया, फिर जो हुआ….

माँ की ममता और बेटे की भूल
हर इंसान अपनी जिंदगी में एक खूबसूरत घर का सपना देखता है। लेकिन असली घर ईंटों से नहीं, एहसासों से बनता है। माँ-बाप की मुस्कान से जो दीवारें सजती हैं, वही आशियाना कहलाता है। और जिनके आशीर्वाद के बिना जो छत उठती है, वो सिर्फ एक खाली ढांचा होती है।
यह कहानी है अभय वर्मा की। एक ऐसे बेटे की जिसने अपनी बूढ़ी लाचार माँ को एक बोझ समझा और उन्हें वृद्धाश्रम की दहलीज पर छोड़ आया। उसे लगा कि उसने अपनी जिंदगी के कांटे को निकाल फेंका है। पर उसे क्या पता था कि अगले ही दिन उसी वृद्धाश्रम का मालिक उसके दरवाजे पर एक ऐसा सच लेकर आएगा जिसे सुनकर उसके पैरों तले की जमीन खिसक जाएगी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि हम अपने माँ-बाप को छोड़ सकते हैं, पर उनके कर्म और उनकी दुआएं हमारा पीछा कभी नहीं छोड़तीं।
अभय की छोटी सी दुनिया
लखनऊ की ऊँची-ऊँची इमारतों और चमकती सड़कों के बीच अभय अपनी छोटी सी दुनिया में बहुत खुश था। एक मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर की नौकरी, सुंदर पत्नी नैना और दो प्यारे बच्चे। अभय की 75 साल की माँ शकुंतला देवी एक रिटायर्ड स्कूल अध्यापिका थीं, अब कमजोर और बीमार रहती थीं। पति के गुजर जाने के बाद वह बिल्कुल अकेली पड़ गई थीं और अपने बेटे अभय के साथ रहने लखनऊ आ गई थीं।
शकुंतला देवी ने अपनी पूरी जिंदगी, अपनी सारी बचत, अपने बेटे अभय की पढ़ाई, लिखाई और उसे एक काबिल इंसान बनाने में लगा दी थी। वह एक स्वाभिमानी और सरल स्वभाव की महिला थीं, जो अपने बेटे की खुशी में ही अपनी खुशी देखती थीं।
पर अभय और उसकी पत्नी नैना की सोच अलग थी। वे अपनी मॉडर्न लाइफस्टाइल में शकुंतला देवी को एक फिट ना होने वाला पुराना फर्नीचर समझते थे। उन्हें लगता था कि माँ की वजह से उनकी आजादी छीन गई है। वे दोस्तों को घर पर नहीं बुला पाते, पार्टी नहीं कर पाते। माँ की खांसी की आवाज, उनकी पुरानी आदतें और उनकी दवाइयों का खर्चा यह सब उन्हें एक बोझ लगता था।
नैना अक्सर अभय से शिकायत करती, “तुम्हारी माँ की वजह से घर का माहौल खराब होता है। बच्चे भी ठीक से टीवी नहीं देख पाते। इन्हें किसी अच्छी जगह पर क्यों नहीं रख देते?”
धीरे-धीरे नैना की इन बातों ने अभय के मन में भी जहर घोल दिया। वह अपनी माँ से खींचा-खींचा रहने लगा। वह भूल गया कि यह वही माँ है जिन्होंने उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था। जिन्होंने अपनी रातें जागकर उसे पढ़ाया था और जिन्होंने अपने सपने बेचकर उसके सपनों को खरीदा था।
वृद्धाश्रम का सफर
एक दिन अभय और नैना ने एक फैसला किया। एक ऐसा फैसला जो किसी भी बेटे के लिए शर्मनाक होता है। उन्होंने अपनी माँ को वृद्धाश्रम में छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपनी माँ से झूठ कहा, “मम्मी, शहर के पास ही एक बहुत अच्छा आश्रम है। वहाँ आपके जैसे बहुत से लोग रहते हैं। वहाँ आपका मन भी लगेगा और आपकी देखभाल भी अच्छी होगी। हम आपको वहाँ घुमाने ले जा रहे हैं।”
शकुंतला देवी अपने बेटे की चाल को समझ नहीं पाई। उन्हें लगा कि शायद उनका बेटा सच में उनकी भलाई के लिए ही यह कह रहा है। वह खुशी-खुशी उनके साथ जाने को तैयार हो गईं।
अगले दिन अभय अपनी गाड़ी में अपनी माँ को बिठाकर शहर से दूर बने एक वृद्धाश्रम ‘सुकून धाम आश्रम’ की ओर चल पड़ा। रास्ते भर शकुंतला देवी अपने बेटे से बातें करती रहीं, बचपन के किस्से सुनाती रहीं और अभय चुपचाप पत्थर का दिल लिए गाड़ी चलाता रहा।
सुकून धाम आश्रम एक बड़ी और साफ-सुथरी जगह थी। पर उसकी दीवारों में एक अजीब सी उदासी और खामोशी थी। अभय ने वहाँ के मैनेजर से बात की, कुछ फॉर्म भरे और एडवांस में पैसे जमा करवाए। जब वह जाने लगा तो शकुंतला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया, “बेटा, तू कब आएगा मुझे लेने?” अभय ने अपनी माँ की आँखों में नहीं देखा। उसने रूखे स्वर में कहा, “आता रहूँगा माँ जी। आप अपना ख्याल रखना।” और वह अपनी गाड़ी में बैठकर वहाँ से चला गया।
उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पीछे वृद्धाश्रम के गेट पर एक बूढ़ी माँ अपनी आँखों में आँसू लिए अपनी उजड़ती हुई दुनिया को देख रही थी।
माँ की रात और अरुण मिश्रा का आगमन
घर आकर अभय और नैना ने राहत की साँस ली। उन्हें लगा जैसे उनके सिर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया है। उन्होंने उस रात पार्टी करने का फैसला किया। अपने दोस्तों को बुलाया और देर रात तक संगीत और शोर में अपनी उस करतूत पर पर्दा डालने की कोशिश करते रहे।
उधर सुकून धाम आश्रम में शकुंतला देवी को एक कमरे में पहुँचा दिया गया। उस कमरे में एक और बुजुर्ग पहले से रहते थे। शकुंतला देवी पूरी रात सो नहीं सकीं। उनकी आँखों के सामने अपने बेटे का चेहरा और उसके कहे हुए आखिरी शब्द घूम रहे थे। उन्हें एहसास हो रहा था कि उन्हें घुमाने नहीं, बल्कि हमेशा के लिए छोड़ने के लिए लाया गया है।
अगली सुबह वृद्धाश्रम के मालिक श्री अरुण मिश्रा अपने रोज के नियम के अनुसार आश्रम के नए सदस्य से मिलने आए। अरुण मिश्रा 50 साल के बेहद शांत और सुलझे हुए इंसान थे। उन्होंने यह वृद्धाश्रम अपने माता-पिता की याद में बनवाया था और इसे किसी बिजनेस की तरह नहीं, बल्कि सेवा के रूप में चलाते थे।
वह शकुंतला देवी के कमरे में पहुँचे। उन्होंने शकुंतला देवी के चेहरे पर उदासी और आँखों में दर्द को पढ़ लिया। उन्होंने बहुत ही प्यार से उनके कंधे पर हाथ रखा, “मम्मी, मैं इस आश्रम का मालिक अरुण हूँ। आप चिंता मत कीजिए, यह भी आपका अपना घर ही है।”
उन्होंने शकुंतला देवी से उनके परिवार के बारे में पूछा। शकुंतला देवी का गला भर आया। उन्होंने रोते हुए अपने बेटे के बारे में बताया। कैसे उन्होंने अपना सब कुछ लगाकर उसे पढ़ाया, लिखाया और आज वही बेटा उन्हें बोझ समझकर यहाँ छोड़ गया।
पूरी बात सुनते हुए अरुण मिश्रा की आँखें भी नम हो गईं। पर जब उन्होंने शकुंतला देवी का नाम और उनके पुराने पेशे यानी स्कूल अध्यापिका होने के बारे में सुना तो वह चौंक पड़े। उन्होंने शकुंतला देवी के चेहरे को बहुत गौर से देखा।
“मम्मी, आप कौन से गाँव के स्कूल में पढ़ाती थीं?” उन्होंने काँपती आवाज में पूछा। शकुंतला देवी ने अपने गाँव का नाम बताया और “आपका पूरा नाम शकुंतला देवी वर्मा है?”
“हाँ बेटा। पर तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो?”
यह सुनते ही अरुण मिश्रा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह अपनी कुर्सी से उठे और रोते हुए शकुंतला देवी के पैरों पर गिर पड़े, “गुरु माँ, आप यहाँ इस हालत में हैं?”
शकुंतला देवी हैरान रह गईं, “बेटा, तुम कौन हो? तुम मुझे गुरु माँ क्यों कह रहे हो?”
अरुण ने अपने आँसू पोंछे और कहा, “गुरु माँ, मैं अरुण हूँ। आपका वही नालायक शिष्य जिसे आप हमेशा कहती थीं कि तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”
शकुंतला देवी ने अपनी धुंधली आँखों से उसे पहचानने की कोशिश की। उन्हें याद आया सालों पहले उनके गाँव के स्कूल में एक बहुत ही गरीब पर होशियार लड़का पढ़ता था – अरुण, जिसके माँ-बाप नहीं थे। शकुंतला देवी ने उसे अपने बेटे की तरह माना। उन्होंने ना सिर्फ उसे मुफ्त में पढ़ाया बल्कि अपनी छोटी सी तनख्वाह से पैसे बचाकर उसकी आगे की कॉलेज की पढ़ाई का खर्चा भी उठाया। उन्होंने ही अरुण को शहर भेजा था और कहा था, “बेटा, इतना बड़ा बनना कि तुम हजारों लोगों की मदद कर सको।”
वह अरुण आज देश का एक बहुत बड़ा उद्योगपति, एक सेल्फ मेड करोड़पति श्री अरुण मिश्रा था। सालों बाद वह अपनी गुरु माँ को इस हालत में अपने ही बनाए वृद्धाश्रम में देख रहा था।
सच्चाई का सामना
अरुण मिश्रा को जब यह पता चला कि अभय जिसने अपनी माँ को यहाँ छोड़ा है, वह कोई और नहीं बल्कि उनकी गुरु माँ का ही बेटा है, तो उनके तन बदन में आग लग गई। उन्होंने फैसला किया कि अभय को उसकी गलती का एहसास कराना जरूरी है।
अगली सुबह अभय अपने घर पर आराम से सोकर उठा था। नैना उसके लिए चाय बना रही थी। दोनों बच्चे स्कूल जा चुके थे। वे दोनों आज अपने घर के उस खाली हुए कमरे को एक मिनी बार बनाने की योजना बना रहे थे। तभी दरवाजे की घंटी बजी। अभय ने दरवाजा खोला। सामने एक अनजान पर बेहद रबदार शख्स खड़ा था।
“जी कहिए,” अभय ने पूछा।
“मैं अंदर आ सकता हूँ?” अरुण मिश्रा ने शांत पर भारी आवाज में कहा।
अभय ने उन्हें अंदर बुलाया। अरुण ने उसके फ्लैट को चारों ओर से देखा। फिर वह सोफे पर बैठ गए। “मैं सुकून धाम आश्रम का मालिक हूँ, जहाँ आप कल अपनी माँ को छोड़कर आए थे।”
यह सुनते ही अभय के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे लगा कि यह शायद और पैसे मांगने आया है या कोई शिकायत करने आया है।
“देखिए मिस्टर, मैंने सारे पैसे जमा करवा दिए हैं और मेरी माँ वहाँ अपनी मर्जी से हैं। आपको कोई दिक्कत है तो…”
अरुण मुस्कुराए। एक ऐसी मुस्कान जिसमें दर्द और गुस्सा दोनों थे। उन्होंने कहा, “दिक्कत मुझे नहीं, अब तुम्हें होने वाली है।”
“क्या मतलब?” अभय अकड़ा।
अरुण ने कहा, “शायद तुम मुझे नहीं जानते। पर तुम्हारी माँ शकुंतला देवी मुझे बहुत अच्छी तरह जानती हैं। वह मेरी गुरु माँ हैं। वह इंसान जिनकी वजह से मैं आज इस मुकाम पर हूँ।”
फिर अरुण ने उसे पूरी कहानी सुनाई। कैसे शकुंतला देवी ने एक अनाथ बच्चे की मदद की और उसे पढ़ाया, लिखाया और काबिल इंसान बनाया। यह सुनकर अभय के होश उड़ गए।
पर असली झटका तो अभी बाकी था। अरुण ने कहा, “अभय, तुम जिस कंपनी में मैनेजर हो, वह मेरी है। तुम जिस फ्लैट में रह रहे हो, यह पूरी बिल्डिंग मेरी है और तुम्हारी यह गाड़ी भी कंपनी के नाम पर है, यानी मेरी है। तुम्हारी माँ की दुआओं और उनकी दी हुई शिक्षा ने मुझे यह सब दिया और तुमने अपने बेटे ने उन्हें क्या दिया… वृद्धाश्रम!”
यह सुनते ही अभय और नैना के पैरों तले की जमीन सचमुच खिसक गई। वे जहाँ खड़े थे, वहीं मूर्ति बन गए। उन्हें अपनी आँखों और कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिस माँ को वह बोझ समझ रहे थे, उनकी पूरी दुनिया, उनकी पूरी हैसियत, उसी माँ के एक शिष्य की दी हुई भीख थी।
अंतिम फैसला और पश्चाताप
अरुण मिश्रा ने शांत पर दृढ़ आवाज में कहा,
“मैं चाहूँ तो एक मिनट में तुमसे तुम्हारा यह सब कुछ छीन सकता हूँ। तुम्हें सड़क पर ला सकता हूँ। पर मैं ऐसा नहीं करूँगा क्योंकि मैं अपनी गुरु माँ की संतान को बर्बाद नहीं कर सकता। पर तुमने अपनी माँ को रखने का हक खो दिया है।”
उन्होंने अभय को एक मौका दिया,
“तुम्हारे पास 24 घंटे हैं। या तो तुम अभी इसी वक्त जाकर अपनी माँ के पैरों पर गिरकर माफी माँगो और उन्हें पूरे सम्मान के साथ घर वापस लेकर आओ और अपनी बाकी की जिंदगी उनकी सेवा में गुजारो, या फिर मेरा यह घर खाली कर दो और कल से नौकरी पर मत आना। फिर देखना कि बिना छत और बिना सहारे के जिंदगी कैसी होती है।”
अभय पूरी तरह टूट चुका था। उसका घमंड, उसकी अकड़ सब कुछ शर्मिंदगी के आँसुओं में बह गया। वह और नैना दोनों भागे-भागे वृद्धाश्रम पहुँचे। वे शकुंतला देवी के पैरों पर गिर पड़े और बच्चों की तरह रोते हुए माफी माँगने लगे।
माँ जो हमेशा से एक माँ थी, उनका दिल पिघल गया। उन्होंने अपने बेटे और बहू को माफ कर दिया। वे अपनी माँ को वापस घर ले आए। उस दिन के बाद अभय एक बदला हुआ इंसान था। उसे समझ आ गया था कि उसकी असली दौलत उसकी माँ है जिन्हें वह कचरे की तरह फेंक आया था। वह और नैना अब अपनी माँ की सेवा में दिन-रात लगे रहते।
अरुण मिश्रा अक्सर अपनी गुरु माँ से मिलने उनके घर आते। अभय के लिए वह अब मालिक नहीं, बल्कि एक बड़े भाई की तरह थे, जिन्होंने उसे उसकी सबसे बड़ी गलती का एहसास कराया था।
कहानी का संदेश
तो दोस्तों, यह कहानी हमें एक कड़ा संदेश देती है। अपने माँ-बाप को कभी बोझ मत समझिए। वे हमारे जीवन की वह नींव हैं जिस पर हमारी सफलता की इमारत खड़ी होती है। अगर नींव ही कमजोर हो गई तो इमारत एक दिन ढह ही जाएगी।
अगर इस कहानी ने आपके दिल पर कोई असर किया है तो हमें कमेंट्स में जरूर बताएं। इस कहानी को लाइक करें और अपने दोस्तों खासकर उन लोगों के साथ शेयर करें जिन्हें शायद इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। और ऐसी ही और कहानियों के लिए हमारे चैनल ‘लाइफ ऑफ स्टोरी’ को सब्सक्राइब करना ना भूलें।
समाप्त
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