बेटे ने माँ से कहा – बहू की मर्जी से रहो वरना दरवाज़ा खुला है… फिर जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी

मां का सम्मान
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर की एक छोटी सी गली में, सुषमा देवी अपने बेटे आदित्य, बहू नेहा और नन्ही पोती आरोही के साथ रहती थीं। उम्र ढल चुकी थी, शरीर थक चुका था, लेकिन दिल में एक ही सहारा था – अपनी दस महीने की पोती आरोही। उसकी मासूम हंसी सुषमा देवी के बूढ़े दिल को जवान बना देती थी।
एक दिन, सुषमा देवी ने आरोही को खिलौनों के बीच फर्श पर बैठाया और खुद जल्दी से बाथरूम चली गई। अचानक बच्ची पीछे लुढ़क गई और जोर-जोर से रोने लगी। घबराई सुषमा देवी दौड़कर आई और उसे गोद में उठाकर प्यार से बहलाने लगी। तभी दरवाजा खुला और नेहा ऑफिस से लौटी। नेहा ने अपनी बेटी को रोते देखा, उसका चेहरा तमतमा गया और उसने ऊंची आवाज में कहा, “यह क्या किया आपने? मेरी बेटी क्यों रो रही है? जरूर आपने गिरा दिया होगा।”
सुषमा देवी कांप गई। डरते हुए बोली, “नहीं बहू, बस थोड़ी देर फर्श पर बैठी थी। खेलते-खेलते लुढ़क गई। मैं तुरंत उठा लाई।” लेकिन नेहा भड़क उठी, “हे भगवान, आप कैसे इतनी लापरवाह हो सकती हैं? आपको बच्ची की देखभाल के लिए रखा है ना कि ऐश करने के लिए। आप जैसी पुरानी सोच वाली गवार औरतें बच्चे को क्या संभालेंगी?”
सुषमा देवी की आंखों से आंसू छलक पड़े। उन्होंने सफाई देने की कोशिश की लेकिन नेहा ने उन्हें बीच में ही रोक दिया, “चुप रहिए, ज्यादा सफाई देने की जरूरत नहीं। सच यह है कि आपको लगता है अगर मैं नौकरी रखूंगी तो इस घर में आपकी नहीं चलेगी। इसी वजह से आप जानबूझकर रोज कोई ना कोई तमाशा करती हैं। याद रखिए अगर मजबूरी ना होती तो मैं अपनी बेटी को आपके पास कभी ना छोड़ती।”
नेहा ने झटके से आरोही को अपनी गोद में खींच लिया। बच्ची और भी जोर से रोने लगी। नेहा ने कसकर उसे सीने से चिपका लिया और बोली, “अब मेरी बेटी को आपकी गोद में एक पल भी नहीं रहने दूंगी।”
सुषमा देवी वहीं सोफे पर बैठ गईं। उनका शरीर कांप रहा था, लेकिन आत्मा उससे भी ज्यादा कांप रही थी। मन ही मन सवाल उठ रहे थे, “क्या मैं सचमुच इतनी बुरी हूं? क्या मैंने जानबूझकर बच्ची को गिराया है? क्या मैं अब इस घर पर बोझ बन चुकी हूं?”
तभी बेटा आदित्य घर लौटा। उसने पत्नी की आंखों में गुस्सा और मां के चेहरे पर टूटन देखी। हैरान होकर बोला, “क्या हुआ नेहा?” नेहा फौरन बोली, “मुझसे मत पूछो, अपनी मां से पूछो। तुम्हारी मां ने हमारी बेटी को गिरा दिया। इन्हें तो चार रोटियों की चिंता है लेकिन पोती को संभालना नहीं आता।”
आदित्य चुपचाप मां की ओर देखता रह गया। वहां एक टूटा हुआ चेहरा था, जो बोलना तो चाहता था लेकिन शब्द गले में ही अटक गए। सुषमा देवी ने सिर झुका लिया जैसे अपराध उनके झुके हुए कंधों पर चिपक गया हो।
नेहा की झिड़कियां रुकने का नाम नहीं ले रही थीं। वह और तेज आवाज में बोली, “अब और सहन नहीं होता। एक कैरेटेकर भी आपसे अच्छा ध्यान रख सकती है। आप बस दिखावा करती हैं। पोती की आड़ में घर पर कब्जा जमाना चाहती हैं।”
इतने में बेटा आदित्य बोला, “बस करो नेहा, अब चुप हो जाओ।” लेकिन नेहा कहां रुकने वाली थी? उसने और तीखे शब्द कहे, “क्यों चुप हो जाऊं? मेरी बेटी मेरी जान है। अगर इसके साथ कुछ हुआ तो मैं कभी माफ नहीं करूंगी। और तुम्हारी मां गांव की गवार औरत है जिसे तुमने सिर पर चढ़ा रखा है। अब मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकती।”
यह सुनकर सुषमा देवी का चेहरा पीला पड़ गया। वे धीरे-धीरे उठीं, दीवार का सहारा लिया और अपने कमरे की ओर चली गईं। उनकी आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे, शायद अब रोने की ताकत भी खत्म हो चुकी थी। पर उनके दिल में कुछ बहुत गहरा टूट चुका था।
कमरे में जाकर वे बिस्तर पर बैठ गईं और पुरानी यादों में डूब गईं। 25 साल पहले जब बेटे आदित्य का जन्म हुआ था, तो उन्होंने पहली बार अपने दिल में नई रोशनी महसूस की थी। उसी दिन उन्होंने ठान लिया था कि चाहे हालात जैसे भी हों, वे अपने बेटे को पढ़ाएंगी, काबिल बनाएंगी और दुनिया को दिखाएंगी कि एक गवार औरत का बेटा भी सितारा बन सकता है।
सुषमा देवी ने अपने छोटे से जीवन को बेटे आदित्य के सहारे ही थाम लिया। खेतों में काम करना, धूप में तपना, दूसरों के घरों में मजदूरी करना, यही उनकी दिनचर्या बन गई। लेकिन हर रात जब वे थक कर लौटतीं और आदित्य को अपनी गोद में लेकर पढ़ाई करातीं, तो उनका दिल फिर से हिम्मत पा लेता।
गांव वाले ताने कसते, “पागल हो गई है। गवार औरत का बेटा अफसर बनेगा कभी नहीं।” कहकर सब हंस पड़ते, लेकिन सुषमा देवी ने किसी की बातों पर ध्यान नहीं दिया। वे रात को लालटेन की हल्की रोशनी में बैठकर आदित्य को पढ़ते देखतीं और खुद भी उसके साथ दो-चार शब्द सीख लेतीं। उन्होंने पेट काटकर बेटे के लिए किताबें खरीदीं। कभी अपनी चप्पल बदलने की बजाय उसके लिए कॉपी ले आईं। खुद भूखी रहकर बेटे को दूध पिलाया।
उनकी मेहनत रंग लाने लगी। आदित्य हर कक्षा में अव्वल आने लगा। गांव का वही छोटा स्कूल अब आदित्य के सपनों को छोटा लगने लगा। उसने शहर के कॉलेज में दाखिला लिया। वहां भी उसकी लगन और मेहनत सबको चौंकाती थी। सालों की तपस्या के बाद वह दिन आया जब खबर मिली कि आदित्य अब सरकारी अफसर बन गया है।
यह सुनते ही सुषमा देवी की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। वे छत के नीचे बैठकर फूट-फूट कर रोईं। लेकिन यह रोना दुख का नहीं, गर्व का था। गांव वाले भी अब वही कहते थे, “इसकी कोख सच में धन्य है।” जो लोग कभी उन्हें गवार और अपमानजनक नामों से बुलाते थे, वही अब उनके घर मिठाई लेकर आने लगे।
जब आदित्य पहली बार अफसर बनकर गांव लौटा, तो सबसे पहले अपनी मां के पांव छुए। सुषमा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, आज तू बड़ा हुआ है, लेकिन याद रखना किसी और मां का सम्मान कभी मत तोड़ना।”
धीरे-धीरे वक्त गुजरा। आदित्य ने शहर की एक आधुनिक लड़की नेहा से शादी कर ली। नेहा को गांव की मिट्टी, रीति-रिवाज और सांस की उपस्थिति सब अजीब लगते थे। जब वह पहली बार गांव आई तो बोली, “अम्मी जी, यहां तो पीने का साफ पानी तक नहीं है। ढंग का वाशरूम भी नहीं है। आप लोग अभी भी ऐसे रहते हैं।”
सुषमा देवी मुस्कुरा कर बोलीं, “हां बहू, हम तो अभी भी मिट्टी की हांडी में छाछ रखते हैं।” लेकिन वह छाछ नेहा के स्वाद के काबिल नहीं थी। शादी के बाद सुषमा देवी अब गांव में ही रहने लगीं। आदित्य महीने में कभी-कभी मिलने आता। मां-बेटे का मिलन अब बस कुछ घंटों तक सीमित हो गया था।
लेकिन जब नेहा मां बनी, तब पहली बार उसे सुषमा देवी की जरूरत पड़ी। उसने कहा, “मम्मी जी, आपको कुछ दिन यहीं रहना होगा। मेरी डिलीवरी है और मुझे छुट्टियां नहीं मिल रही हैं।” सुषमा देवी के लिए यह पल किसी अमृत से कम नहीं था। उन्होंने अपनी पोती आरोही को गोद में उठाकर सारा दर्द भूल जाना चाहा। नन्ही बच्ची की किलकारियां सुनकर उनका दिल खिल उठा।
शुरुआत में सब ठीक चला। वे बच्ची को नहलातीं, तेल मालिश करतीं, लोरी सुनातीं। आरोही भी उनसे जुड़ने लगी। लेकिन धीरे-धीरे नेहा की बातें बदलने लगीं। कभी कहती, “मम्मी जी, बच्ची को ज्यादा गोदी में मत लिया कीजिए, वरना मेरी गोद में नहीं आएगी।” कभी कहती, “मम्मी जी, उसे आपकी लोरियां मत सुनाइए, आपकी आदत पड़ जाएगी।”
सुषमा देवी चुप रह जातीं। बस मन ही मन सोचतीं, “क्या पोती की हंसी सुनने का भी अब मुझे हक नहीं रहा?” समय बीतने के साथ नेहा का रवैया और कठोर होता गया। एक दिन उसने साफ कह दिया, “अब से आरोही को सुलाने का काम सिर्फ मैं करूंगी। आप उसे गोद में मत लिया कीजिए।”
सुषमा देवी का दिल टूट गया। उन्होंने आंसू रोक लिए और चुपचाप सिर झुका लिया। बेटे की खुशी और घर का माहौल बिगड़ ना जाए, इसलिए उन्होंने कुछ नहीं कहा। लेकिन एक दिन उन्होंने हिम्मत करके बेटे आदित्य से पूछ ही लिया, “बेटा, तेरी बहू मुझसे बात क्यों नहीं करती? मैंने तो कभी उसका बुरा नहीं चाहा।”
आदित्य ने लापरवाही से कहा, “मां, बहू की मर्जी है किससे बात करनी है और किससे नहीं। यह उसका अधिकार है। वैसे भी सास-बहू का रिश्ता ऐसा ही होता है। आप बस चुपचाप खुश रहिए।”
यह सुनकर सुषमा देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने सोचा, “क्या मेरा बेटा इतना बदल गया है, जो मां अपनी सारी उम्र बेटे के लिए जी, उसके लिए अब घर में जगह भी कम पड़ गई।” वे और भी चुप रहने लगीं। बस रसोई में काम करतीं और पोती की खिलखिलाहट सुनने को तरस जातीं। जब-जब वे बच्ची के पास जातीं, नेहा कोई ना कोई बहाना बनाकर उसे दूर ले जाती।
एक दिन सुषमा देवी की तबीयत बिगड़ गई। शुगर का स्तर बहुत बढ़ गया था। कमजोरी इतनी थी कि हर थोड़ी देर में बाथरूम जाना पड़ रहा था। उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा, “बहू, आज मेरी तबीयत बहुत खराब है। तू ऑफिस मत जा। मैं शायद आरोही का ठीक से ध्यान ना रख पाऊं।”
नेहा ने तिरछी नजर डालते हुए तीखे स्वर में कहा, “आपको तो रोज ही कुछ ना कुछ होता रहता है। कोई दिन नहीं जाता जब आपको आराम ना चाहिए। सच बताइए, आपको यहां रहने का कोई मतलब ही नहीं है। गांव में रहना था तो वहीं रहती।”
सुषमा देवी चुप हो गईं। आदित्य भी यह सब सुन रहा था, लेकिन हमेशा की तरह उसने कुछ नहीं कहा। बस फीकी नजर से मां को देखा और ऑफिस चला गया। शाम को जब सुषमा देवी को बाथरूम जाना पड़ा, तो उन्होंने आरोही को खिलौनों के बीच फर्श पर बिठा दिया। उन्हें लगा बच्ची खेलते-खेलते सुरक्षित रहेगी। लेकिन खेलते-खेलते आरोही पीछे लुढ़क गई और जोर-जोर से रोने लगी।
घबराई सुषमा देवी दौड़ कर आई और उसे गोद में उठा लिया। प्यार से बहलाने लगीं, “अरे मेरी गुड़िया, कुछ नहीं हुआ। चुप हो जा बेटा।” उसी समय दरवाजा खुला। नेहा ऑफिस से लौटी थी। जैसे ही उसने अपनी बेटी को रोते देखा, उसकी नजर सीधी सास पर गई। वह गुस्से से चिल्लाई, “क्या किया आपने? आप एक बच्ची को भी संभाल नहीं सकती भगवान के लिए। आपको गांव में ही छोड़ देना चाहिए था। शहर में क्या करने आई हैं?”
सुषमा देवी कुछ कह भी नहीं पाई थीं कि नेहा ने झटके से बच्ची को उनकी गोद से छीन लिया। “अब मेरी बेटी को आप हाथ भी नहीं लगाएंगी। आप जैसी औरतें सिर्फ बोझ होती हैं।”
सुषमा देवी स्तब्ध खड़ी रह गईं। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने सोचा, “क्या इसी दिन के लिए मैंने अपना सब कुछ कुर्बान किया था? क्या इसी दिन के लिए बेटे को पढ़ाया था?”
उस रात वे बहुत देर तक बिस्तर पर जागती रहीं। पोती की रोने की आवाज उनके कानों में गूंज रही थी। लेकिन उससे भी ज्यादा बहू की बातें उनके दिल को घायल कर रही थीं। और उसी रात सुषमा देवी ने मन ही मन ठान लिया, “अब और नहीं।”
अगले दिन घर में नेहा की सहेलियां किटी पार्टी के लिए आईं। सुषमा देवी चुपचाप रसोई में चाय-नाश्ता बना रही थीं। जैसे ही वह ट्रे लेकर ड्राइंग रूम में पहुंचीं, एक सहेली हंसते हुए बोली, “वाह नेहा, तेरी तो किस्मत अच्छी है। तेरी सास खुद चाय परोस रही है।”
दूसरी सहेली ने कहा, “हां यार, तूने अपनी सास को कंट्रोल में कैसे रखा है? हमें भी बता दे।” नेहा मुस्कुराई और बोली, “बहुत आसान है। सास को कंट्रोल में करना है तो बस दो बातें जरूरी हैं। बेटा इकलौता होना चाहिए और सास पैसों के लिए तुम पर निर्भर होनी चाहिए। फिर देखना वह तुम्हारे सामने एक शब्द भी नहीं बोलेगी।”
यह सब बातें सुषमा देवी ने भी सुन लीं। उनका दिल गहरे तक आहत हुआ। अचानक वे वहीं सोफे पर बैठ गईं और साफ आवाज में बोलीं, “बहू, यह घर आज भी मेरे नाम पर है। तुम इस घर की बहू हो, तुम्हारा सम्मान है। लेकिन भूलना मत कि यह घर मेरा है।”
सहेलियां चुप हो गईं। नेहा का चेहरा लाल पड़ गया। वह गुस्से से बोली, “मम्मी जी, मेरी सहेलियों के सामने मुझे शर्मिंदा कर रही हैं। आपने मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी।”
सुषमा देवी ने शांत स्वर में कहा, “इज्जत तो तब मिट्टी में मिली थी जब तुमने मुझे हंसते-हंसते गवार और बोझ कहा था। माफी मांगना अगर तुम्हें सही लगता है तो सुन लो, मैं माफी नहीं मांगूंगी।”
यह सुनते ही सहेलियां वहां से उठकर चली गईं। नेहा गुस्से में बोली, “आज आदित्य आएगा तो सब साफ हो जाएगा। या तो आप रहेंगी, या मैं।”
शाम को आदित्य घर लौटा। नेहा ने रोते-गुस्से में सब कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बता दिया। आदित्य ने गुस्से में मां से कहा, “मां, आपको शर्म नहीं आई? आप मेरी पत्नी की बेइज्जती कर रही हैं। अगर आपको इस घर में रहना है तो उसकी मर्जी से रहना होगा, वरना दरवाजा खुला है।”
यह सुनकर सुषमा देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। बहू के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी जैसे उसकी जीत हो गई हो। लेकिन उसी पल सुषमा देवी ने सीधे स्वर में कहा, “ठीक है बेटा, अब मुझे भी सब समझ आ गया है। अब मैं किसी की बैसाखी बनकर नहीं रहूंगी। एक हफ्ते का वक्त दे रही हूं, तुम लोग अपना बंदोबस्त खुद कर लो।”
बेटा-बहू को लगा कि मां बस गुस्से में कह रही है, लेकिन कुछ ही दिनों में सुषमा देवी ने वह घर बेच दिया और गांव लौट आईं। गांव पहुंचकर उन्होंने अपने टूटे घर की मरम्मत करवाई। आंगन में तुलसी का पौधा लगाया और दो गाय खरीदकर दूध का काम शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे वे आत्मनिर्भर हो गईं। गांव की कई विधवा औरतों को भी उन्होंने काम पर लगा दिया। उधर नेहा और आदित्य की मुश्किलें बढ़ गईं। ऑफिस, किराए का घर और बच्ची की देखभाल संभालना मुश्किल हो गया। एक केयरटेकर रखी लेकिन वह बच्ची को ठीक से ना संभाल पाई। आरोही कमजोर पड़ने लगी।
तभी नेहा को एहसास हुआ कि उसने सास के साथ कितना बड़ा अन्याय किया है। एक दिन वह गांव पहुंची। सास के पैरों में गिरकर बोली, “मां जी, मुझे माफ कर दीजिए। हमारे साथ चलिए।” सुषमा देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा और शांत स्वर में बोलीं, “बहू, माफ किया। लेकिन अब मैं अपने आत्मसम्मान को कभी नहीं छोडूंगी। अब मेरा घर यही है। मेरी मिट्टी यही है।”
आदित्य भी वहीं खड़ा था। आंखों में पछतावा था। लेकिन मां अपने फैसले पर अडिग रहीं।
दोस्तों, मां का त्याग और सम्मान अनमोल है। जो बेटे-बहू उसे समझ नहीं पाते, वे अंत में पछतावे के सिवा कुछ नहीं पाते।
क्या सच में मां का सम्मान सिर्फ तब तक होता है जब तक वह बेटे-बहू के काम आती है?
क्या आप भी अपने मां के साथ कहीं ऐसा व्यवहार तो नहीं कर रहे हैं?
अपना जवाब जरूर लिखिए।
अगर यह कहानी दिल को छू गई हो तो इसे जरूर साझा करें।
रिश्तों की कीमत समझिए, मां का सम्मान कीजिए।
जय हिंद।
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