मासूम बेटे की जिद की वजह से पिता एक अजनबी औरत को किराये की पत्नी बना लाया , फिर जो हुआ देख सभी के

“गुल्लक की ममता”
आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूं जो आपको अंदर तक झकझोड़ देगी और शायद आपकी आंखों को नम कर देगी। सोचिए, एक चार साल का मासूम बच्चा अपने पिता से कहता है, “पापा, मुझे बाजार से मम्मी लाकर दो,” और इतना कहकर वह अपनी छोटी सी गुल्लक लाकर पिता के हाथों में रख देता है। क्या एक पिता अपने बच्चे की इस असंभव सी लगने वाली ज़िद को पूरा कर पाएगा? क्या कोई मां पैसों से खरीदी जा सकती है? जब एक पिता अपने बेटे की खुशी के लिए एक अजनबी महिला को घर ले आता है, तो उस रात ऐसा क्या हुआ जिसने न सिर्फ उस घर को हमेशा के लिए बदल दिया, बल्कि हर इंसान को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या मां का रिश्ता खून का होता है या अपनाने का? इस दिल को छू लेने वाली कहानी में भावनाओं का एक ऐसा सैलाब है जो आपको अंत तक बांधे रखेगा।
शुरुआत
शाम का समय था। मोहित काम से थका हारा अपने घर लौटा। दरवाजा खुलते ही उसका चार साल का बेटा रौनक दौड़कर आया और बोला, “पापा, आप बाजार से मम्मी ले आओ। मुझे मम्मी से मिलना है।” मोहित सन्न रह गया। उसका गला भर आया। उसने बेटे को सीने से लगाकर कहा, “बेटा, मेरे पास पैसे नहीं हैं। बिना पैसों के मैं तुम्हारे लिए मम्मी कैसे लाऊं?” यह सुनते ही रौनक की आंखें छलक गईं। वह चुपचाप अंदर गया और थोड़ी देर बाद अपनी छोटी सी गुल्लक लेकर आया। गुल्लक उसके नन्हे हाथों में कांप रही थी। आंखों में आंसू थे। उसने गुल्लक पिता के हाथ पर रख दी और बोला, “पापा, पैसे तो मैंने इकट्ठा कर लिए हैं। आप यह ले लो और मुझे मम्मी लाकर दो। मुझे मम्मी की बहुत याद आती है।”
बच्चे की यह मासूमियत देखकर मोहित का कलेजा चीर गया। उसकी आंखों से भी आंसू बह निकले। उसने सोचा, “हे भगवान, इस नासमझ को कैसे समझाऊं कि मां पैसों से नहीं आती।” लेकिन बेटे की जिद्द और आंसू देखकर वह खुद टूट गया। कुछ देर चुप रहने के बाद उसने बेटे के गाल पोंछे और बोला, “ठीक है बेटा, तुम जरा इंतजार करो। मैं अभी तुम्हारे लिए मम्मी लेकर आता हूं।” रौनक की आंखों में चमक आ गई। उसने मासूम हंसी बिखेरते हुए कहा, “सच पापा, आप अभी मम्मी लाओगे?” मोहित ने सर हिलाकर हामी भर दी।
भारी मन और कांपते कदमों से वह घर से बाहर निकल गया। बाहर निकलते ही उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। गली के कोने पर खड़े होकर उसने आसमान की ओर देखा और मन ही मन कहा, “हे भगवान, मुझे इतनी ताकत देना कि मैं अपने बेटे का दिल ना तोड़ूं। उसका बचपन मां के बिना उजड़ ना जाए।” मोहित यादों में खो गया। उसे रूपाली की मुस्कान याद आई। वह दिन याद आया जब शादी के बाद दोनों ने छोटे से घर को हंसी खुशी से सजाया था। उसे रूपाली का वह चेहरा याद आया जब उसने पहली बार बेटे को गोद में उठाया था। और फिर याद आया वह मनहूस दिन जब रूपाली हमेशा के लिए आंखें मूंद गई थी।
यादों का सैलाब
रूपाली ने एक दिन कहा था, “सीने में दर्द हो रहा है।” मोहित डॉक्टर के पास ले जाना चाहता था, मगर रूपाली ने हंसकर कहा, “कल ठीक हो जाएगा।” लेकिन वह कल कभी नहीं आया। अगली सुबह वह बिस्तर से उठी ही नहीं। रूपाली की सांसे थम चुकी थी। उस दिन मोहित की दुनिया उजड़ गई थी। रूपाली की चिता की आग में सिर्फ उसका जीवन साथी ही नहीं बल्कि उसके घर की खुशियां भी जलकर राख हो गई थी। तब से मोहित अकेले बेटे को संभाल रहा था। वह रौनक को बहलाने के लिए कहता, “मम्मी बाहर गई है, जल्दी लौटेंगी।” लेकिन समय के साथ बेटा बड़ा होने लगा और सवाल पूछने लगा और अब उसकी यह जिद मोहित के लिए पहाड़ बन गई थी।
मोहित जनता था कि बेटे को बहलाने का वक्त बीत चुका है। अब उसे कोई रास्ता निकालना ही होगा। उसने गहरी सांस ली और मन ही मन तय किया कि वह किसी से बात करेगा। भारी कदमों से वह अपने पड़ोसी संजय के घर की ओर बढ़ गया।
मोहित की कोशिश
जब मोहित पड़ोसी संजय के दरवाजे पर पहुंचा, दस्तक दी तो संजय बाहर आया। मोहित की आंखें लाल थीं, आवाज भारी। “संजय, तूने बच्चों के सामने क्यों कहा कि बाजार से पैसों से मम्मी ले आएंगे? मेरा बेटा उस बात को सच मान बैठा है। आज उसने गुल्लक मेरे हाथ पर रख दी।” संजय आवाक रह गया। उसने तुरंत हाथ जोड़ दिए, “भाई, गलती हो गई। उस दिन मेरी पत्नी गुस्से में मायके जाने की बात कर रही थी। बच्चे ने पूछा तो मैंने मजाक में कह दिया नहीं मम्मी ले आएंगे। मुझे क्या पता था रौनक सुन लेगा और दिल पर ले लेगा।”
मोहित दीवार से टिक गया, “अब क्या करूं? उसका हर आंसू मुझे तोड़ देता है। उसे कैसे समझाऊं कि मां खरीदी नहीं जाती।” संजय कुछ पल चुप रहा। फिर झिझकते हुए बोला, “एक रास्ता है अगर तू मना ना करे। मैं एक जगह जानता हूं जहां औरतें मजबूरी में पैसों के लिए आती जाती हैं। गलत मत समझ। मैं जानता हूं तू शरीफ आदमी है। बात बस इतनी है कि किसी से कहना बच्चे को थोड़ी देर मां की तरह सीने से लगाकर सुला दे। बस नौ से ज्यादा ना कम। बच्चे को लगेगा मां लौट आई है।” मोहित ने तुरंत सिर हिलाया, “नहीं यह सही नहीं है।” लेकिन अगले ही पल उसे रौनक की भीगी आंखें याद आ गई। गुल्लक थमाते हुए बोला था, “पापा पैसे तो जमा कर लिए हैं।”
मोहित की मजबूती टूटती चली गई। उसने धीमे स्वर में कहा, “ठीक है। बस बच्चे की खातिर और कोई बेइज्जती नहीं होगी किसी की।”
रेखा का आगमन
रात गहराने लगी थी। दोनों ऑटो लेकर उस इलाके की तरफ चले जिसके नाम से लोग असहज हो जाते हैं। सुनसान सड़कों पर टिमटिमाती पीली लाइटें थीं। मोहित का हाथ स्टीयरिंग पर कसता जा रहा था। उसके मन में एक ही वाक्य घूम रहा था, “मुझे अपने बच्चे का दिल नहीं तोड़ना।” वहां पहुंचकर संजय ने दो-तीन औरतों से बात की। सभी ने पहले दाम सुने फिर माथा सिकोड़ लिया, “इतने कम और काम क्या है?” संजय बार-बार समझाता, “काम कुछ नहीं बस बच्चे को गोद में लेकर सुला देना है।” लोगों को यकीन नहीं हुआ। कुछ ने सीधे मना कर दिया, “ऐसी बातों में नहीं पड़ते।”
कई कोशिशों के बाद दोनों थक कर पास की चाय की दुकान पर बैठ गए। मोहित बिल्कुल चुप। तब से उठती भाप में उसे बेटे का चेहरा दिख रहा था। तभी बेंच पर बैठा एक मध्यम उमर आदमी पास खिसका, “भाई क्या दिक्कत है? चेहरों पर ऐसी मायूसी क्यों?” संजय ने टालना चाहा पर मोहित का गला भर आया। उसने पूरी बात साफ-साफ कह दी। आदमी ने ध्यान से सुना। फिर धीमे से बोला, “अगर इरादा साफ है तो मैं एक नंबर देता हूं। लड़की नहीं, एक इज्जतदार औरत है। मजबूर है। पिता बीमार है। कभी-कभार पैसों के लिए काम करती है, पर शरीफ है। नाम है रेखा। बात प्यार से करना। डराने की कोशिश मत करना।”
नंबर मिल गया। मोहित के हाथ कांप रहे थे। उसने फोन मिलाया। उधर से थकी सी महिला आवाज आई, “जी कौन?” मोहित ने संयत होकर कहा, “मेरा नाम मोहित है। कोई गलत बात नहीं करनी। बस मेरे छोटे बेटे को मां की गोद चाहिए। थोड़ी देर के लिए उसे सुला दीजिए। ₹500 दूंगा और पूरी इज्जत के साथ आपको वापस छोड़ दूंगा।” कुछ सेकंड सन्नाटा रहा। फिर उधर से धीमी सी सांस सुनाई दी, “कहां आना होगा?” “नंदन चौक। मैं ऑटो में हूं। मैं आपको वहीं से ले लूंगा।” वो फिर बोली, “मैं शर्त रखती हूं। मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं होगी। और अगर बच्चा रोएगा तो धैर्य रखोगे।” मोहित की आवाज बाहर आ गई, “कसम से सिर्फ बच्चे की खातिर बुला रहा हूं।” कॉल कट गई।
ममता का जादू
ऑटो गियर में पड़ा। सन्नाटा चीरती गाड़ी उस पिकअप पॉइंट की ओर बढ़ी जहां दूसरी तरफ अपनी मजबूरियां और उम्मीदों के साथ रेखा इंतजार कर रही थी। तय जगह पर पहुंचते ही मोहित ने देखा गली के कोने पर एक औरत खड़ी थी। साथ ही लेकिन साफ सलवार-कुर्ते में चेहरा हल्का सा ढका हुआ। वही थी रेखा। वो जैसे ही ऑटो के पास आई और देखा कि अंदर दो आदमी बैठे हैं, उसके कदम रुक गए। उसने तुरंत कहा, “नहीं मैं नहीं आऊंगी।” उसकी आवाज में डर और गुस्सा दोनों थे।
मोहित ने जल्दी-जल्दी हाथ जोड़ते हुए कहा, “डरो मत। तुम्हारे साथ कुछ गलत नहीं होगा। देखो मैं सिर्फ अपने बेटे की खातिर आया हूं। वो बच्चा मामा पुकार रहा है। उसने गुल्लक तक मेरे हाथ पर रख दी। बस तुम्हें थोड़ी देर उसके सिर पर हाथ फेर कर सुला देना है। इसके अलावा कुछ नहीं।” रेखा ने ध्यान से मोहित की आंखों में देखा। उसमें वो झूठ नहीं बल्कि एक टूटा हुआ पिता दिख रहा था। उसके मन में ख्याल आया, “शायद यह आदमी सच कह रहा है।” कुछ पल चुप रही। फिर धीमे स्वर में बोली, “ठीक है चलो।”
मोहित ने चैन की सांस ली। उसने दरवाजा खोला और रेखा को बैठने दिया। ऑटो धीरे-धीरे चल पड़ा। रास्ते भर तीनों चुप रहे। घर पहुंचे तो दरवाजा खुलते ही सामने से रौनक भागता हुआ आया। उसकी आंखों में चमक थी। उसने पिता से पूछा, “पापा, क्या यही है वो मम्मी जिसे आप पैसों से लाए हो?” मोहित ने चुपचाप सिर हिलाया। रौनक खुशी से उछल पड़ा। अगले ही पल उसने रेखा को कसकर गले लगा लिया और रोते हुए बोला, “म्मा, आपको पता भी है मैंने आपको कितना मिस किया है।”
रेखा हिल गई। उसके दिल में जैसे किसी ने चिंगारी जला दी हो। आंखें नम हो गई। उसने भी तुरंत बच्चे को बाहों में भर लिया। यह आलिंगन नकली नहीं था। यह उस मासूम की तड़प थी जिसने उसे मां बना दिया था। मोहित यह दृश्य देखकर चुपचाप दूसरे कमरे में चला गया। उसके होंठ कांप रहे थे। मन ही मन उसने कहा, “धन्यवाद भगवान। कम से कम आज मेरा बच्चा चैन की नींद सो पाएगा।”
रिश्तों का बदलता रंग
उधर रेखा रौनक को कमरे में ले गई। बच्चा लगातार बातें करता रहा, “मम्मा, आप कहां चली गई थी? मैं रोज पापा से कहता था कि आपको लाएं। देखो मैंने आपके लिए पैसे भी बचाए हैं।” उसने अपनी गुल्लक उठा ली और रेखा के सामने रख दी। रेखा के आंसू अब थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने बच्चे को चुप कराया, माथे को चूमा और धीरे-धीरे लोरियां देने लगी। कुछ देर बाद रौनक मुस्कुराते हुए उसकी गोद में ही सो गया।
रात का सन्नाटा और गहरा हो गया। रेखा ने धीरे से बच्चे का सिर तकिए पर रखा और बाहर आ गई। वहां मोहित खड़ा इंतजार कर रहा था। उसने सिर झुका कर कहा, “आपका बेटा बहुत मासूम है। उसके आंसू देखकर मेरा दिल भी कांप गया।” मोहित ने बिना कुछ बोले वादे किए पैसे दिए और कहा, “चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूं।” ऑटो में वापस लौटते हुए दोनों चुप थे। पर रेखा का मन अजीब तरह से बेचैन था। जाते-जाते उसने धीमी आवाज में कहा, “अगर कभी दोबारा जरूरत पड़े तो बुला लेना। मैं आ जाऊंगी। क्योंकि उस बच्चे की मासूमियत ने मुझे अंदर तक छू लिया है।” मोहित ने हल्की सी नजर उठाई मगर कुछ बोला नहीं। रेखा अपने गली के मोड़ पर उतर गई।
ममता की डोर
लेकिन उस रात रेखा को नींद नहीं आई। आंखें मूंदते ही बार-बार वही मासूम चेहरा सामने आ जाता, “मम्मा आपको पता है मैंने कितना मिस किया?” कुछ दिन तक सब सामान्य रहा। लेकिन फिर वही पुरानी ज़िद रौनक के मन में जाग उठी। वो बार-बार पापा से कहने लगा, “पापा, मुझे फिर से मम्मी चाहिए। आप उस दिन जैसी मम्मी फिर लेकर आओ।” मोहित पहले टालता रहा लेकिन बेटे की आंसू भरी आंखों के सामने उसकी मजबूरी हार गई। उसने कांपते हाथों से रेखा को फोन किया।
उधर से रेखा की थकी लेकिन परिचित आवाज आई। मोहित ने हिचकते हुए कहा, “रौनक फिर से मम्मी की जिद कर रहा है। अगर तुम्हें दिक्कत ना हो तो आज आ जाओ।” कुछ देर चुप्पी रही। फिर रेखा बोली, “ठीक है, मैं आ जाऊंगी।”
रात को रेखा घर पहुंची। इस बार रौनक और भी खुश था। दौड़ते हुए उसके गले से लिपट गया। बोला, “म्मा, अब आप मुझे छोड़कर मत जाना।” रेखा का दिल पिघल गया। उसने बच्चे को गोद में लेकर थपथपियां दी और धीरे-धीरे उसे सुला दिया। लेकिन आज कुछ नया हुआ। बच्चे को सुलाते-सुलाते रेखा की भी आंख लग गई। जब मोहित रात को कमरे में गया तो उसने देखा रौनक गहरी नींद में था और रेखा उसके पास बैठे-बैठे खुद भी सो चुकी थी। उस दृश्य ने मोहित को अंदर तक झकझोड़ दिया। उसके होठों पर अनजाने में हल्की मुस्कान आ गई। उसने सोचा, “कितनी सहजता से यह औरत मेरे बेटे के लिए मां बन गई है।”
सुबह के चार बजे मोहित ने रेखा को धीरे से जगाया। उसने झेपते हुए कहा, “माफ करना। मैं सो गई थी।” मोहित ने बस इतना कहा, “कोई बात नहीं। बच्चे को चैन की नींद मिली। मेरे लिए वही काफी है।” उसने उसे पैसे दिए और ऑटो से वापस छोड़ आया।
रिश्ते की नई शुरुआत
अब हालात बदल चुके थे। यह एक बार का सिलसिला नहीं रहा। दस दिन बाद, पंद्रह दिन बाद, कभी-कभी एक महीने बाद, जब भी रौनक मां की जिद करता मोहित रेखा को बुला लेता। धीरे-धीरे रौनक के लिए रेखा सिर्फ मेहमान मम्मी नहीं रही, बल्कि सचमुच उसकी मां जैसी बन गई। वह उसके साथ खेलता, बातें करता, उसे गले लगाकर सोता। और हैरानी की बात यह थी कि, रेखा भी उस मासूम से गहरा लगाव महसूस करने लगी थी। कभी-कभी तो वह पैसे लेने से भी मना कर देती। कहती, “मोहित, यह बच्चा मुझे इतना अपना मान चुका है। अब इसके साथ रहना मेरे लिए बोझ नहीं, सुख है।”
मोहित समझता था कि रेखा हालात की मार झेल रही है। लेकिन उसके दिल में भी यह एहसास होने लगा कि शायद यही औरत उसके बेटे की जिंदगी का खालीपन भर सकती है। दिन बीतते-बीतते छह महीने गुजर गए। इस बीच रेखा और रौनक का रिश्ता इतना गहरा हो गया कि बच्चा उसे सच्ची मां मानने लगा। अब वह हर छोटी-बड़ी बात उसी से कहता, उसी की गोद में चैन से सोता और उसी की हंसी देखकर खिलखिलाता। मोहित यह सब देखता और सोचता, “जिस कमी को मैं पैसे से पूरा करना चाहता था, उसे तो इस औरत ने अपने स्नेह से भर दिया। क्या यह सिर्फ मजबूरी है या इसके दिल में सचमुच अपनापन है?”
अंतिम मोड़
एक दिन रौनक रेखा की गोद में सो रहा था। रेखा उसके बालों पर हाथ फेरते हुए भावुक हो गई। उसने धीमी आवाज में कहा, “मोहित, मैं जानती हूं मैं कौन हूं और कैसी जिंदगी जी रही हूं। लेकिन सच कहूं, इस मासूम से अलग नहीं रह पाती। इसकी मासूम हंसी मुझे जिंदा रखती है। अगर तुम चाहो तो…” वह रुक गई। उसकी आंखें भर आईं। मोहित ने उसकी आंखों में देखा और उसकी बात पूरी की, “तो क्यों ना हम शादी कर लें। मेरा बेटा हमेशा मां की छांव में रहेगा और तुम्हें भी एक घर मिलेगा।”
रेखा चौकी फिर सिर झुका लिया, “पर मैं इस लायक तो नहीं।” मोहित ने तुरंत कहा, “लायक वही है जो दिल से अपनाए और तुमने मेरे बेटे को अपने बेटे से भी ज्यादा अपनाया है।”
कुछ दिनों बाद दोनों ने एक मंदिर में सादगी से शादी कर ली। रेखा का बूढ़ा पिता भी इस रिश्ते से संतुष्ट था। अब रेखा घर की बहू और रौनक की मां थी। रौनक ने मासूम खुशी से मोहित से कहा, “पापा, अब मम्मा हमेशा हमारे पास रहेंगी ना?” मोहित ने बेटे को गले लगाकर जवाब दिया, “हां बेटा, अब कभी जुदाई नहीं होगी।” रेखा ने रौनक को सीने से लगाते हुए कहा, “नहीं बेटा, अब मैं हमेशा तुम्हारी मम्मा रहूंगी।”
उस छोटे से घर में जो खालीपन था, वह भर गया। अब वहां फिर से हंसी-खुशी गूंजने लगी।
कहानी की सीख
दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि मां का रिश्ता पैसों से नहीं खरीदा जा सकता। मां वही होती है जो दिल से अपनाती है, बच्चे को स्नेह देती है और उसके आंसू पोंछती है। रिश्ते हमेशा खून से नहीं, बल्कि अपनाने से भी बनते हैं।
अब एक सवाल आपसे—क्या मोहित का यह फैसला सही था कि उसने रेखा को अपनाकर अपने बेटे को मां दी? अपनी राय जरूर बताइए। अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो, तो इसे शेयर कीजिए ताकि और लोग भी रिश्तों के असली मायने समझ सकें।
समाप्त
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