लड़का रेलवे ट्रैक पर खड़ा होकर ट्रेन रोक रहा था.. लोको पायलट ने पूछा ‘क्यों – फिर जो हुआ!

ट्रेन की पटरी पर हिम्मत – अभिराज और समरजीत की रात
भूमिका
कहते हैं, रेलवे स्टेशन पर खोए बच्चे मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं।
पर उस शाम 12 साल का एक लड़का पटरी पर खड़ा होकर आती हुई ट्रेन रोक देता है।
भोपाल जंक्शन की भीड़ अचानक रुक गई।
सबकी नजरें उस दुबले-पतले बच्चे पर टिक गईं।
उसका नाम था अभिराज रावत।
उसकी आंखों में डर नहीं, बल्कि एक दुख था – उम्र से बड़ा।
शुरुआत – ट्रेन रोकने की वजह
ट्रेन चीखते हुए रुकी।
लोको पायलट समरजीत चौहान नीचे कूदे – “क्या कर रहा था तू? मरना है क्या?”
अभिराज के होंठ कांपे – “नहीं सर, मुझे अपनी मां को ढूंढना था।”
समरजीत का गुस्सा थम गया।
“मां कहां है?”
अभिराज ने जेब से एक फटा हुआ गुलाबी दुपट्टे का कोना निकाला, जिस पर छोटे धागों से लिखा था – ए आर।
“सर, यह यहीं मिला। मेरी मां इसी ट्रेन में थी और फिर गायब हो गई।”
भीड़ एकदम शांत।
“आखिरी बार कहां देखा था?”
“जनरल कोच के पास, एक आदमी उनकी कलाई पकड़कर ले जा रहा था। मम्मी डर गई थी, मैं चिल्लाया, पर वह मुड़ भी नहीं पाई।”
“चेहरा दिखा?”
“टोपी पहने था, लेकिन उसकी शर्ट पर नीला पेंट था – मेरा स्कूल प्रोजेक्ट वाला पेंट। वो मुझसे टकराया था।”
तभी एक चाय वाला बोला – “साहब, मैंने भी देखा था, कोई औरत को खींचते हुए डी चार की तरफ ले गया, बहुत जल्दी में था।”
अभिराज रोने लगा – “सर, अगर ट्रेन चल जाती तो मैं मम्मी को हमेशा के लिए खो देता। इसलिए रोक दी।”
समरजीत ने कंधे पर हाथ रखा – “डरो मत, आज तेरी मां को ढूंढे बिना यह ट्रेन एक कदम भी आगे नहीं बढ़ेगी।”
खून के निशान – डर का माहौल
स्टेशन मास्टर भागते हुए आया – “सर, डी चार कोच की सीढ़ियों के पास खून की बूंदें मिली हैं।”
भीड़ में दहशत छा गई।
अभिराज का चेहरा सफेद पड़ गया – “सर, मम्मी को कुछ हुआ क्या?”
समरजीत की आवाज कांप रही थी – “चलो देखते हैं।”
दोनों डी चार की ओर बढ़े।
टॉर्च की रोशनी में सीटों के नीचे एक दुपट्टा फंसा था – वही रंग, वही कपड़ा, कोने पर लिखा था एस और छोटे-छोटे खून के सूखे धब्बे।
“सर, यह मेरी मम्मी का है।”
पीछे से कोई चिल्लाया – “साहब, वही टोपी वाला आदमी दूसरे कोच में भागा है, उसके बैग से किसी औरत का नीला कपड़ा दिख रहा है।”
खोज जारी – ट्रेन में अफरातफरी
“बेटा, तेरी मां इस ट्रेन में कहीं है और हम उन्हें एक सेकंड भी नहीं खोएंगे।”
अभिराज की आंखों से आंसू गिरते रहे – “सर, कृपया उन्हें बचा लीजिए।”
समरजीत ने दुपट्टा कसकर पकड़ा, चेहरे पर वही भाव था जो किसी अपने को खो रहे इंसान के चेहरे पर आता है।
स्टेशन मास्टर को कहा – “अनाउंसमेंट करो, कोई भी इस ट्रेन से बाहर नहीं जाएगा। सारे प्लेटफार्म गेट बंद।”
पुलिस दौड़ पड़ी, पर समरजीत इंतजार नहीं कर रहा था।
अभिराज का हाथ पकड़ा – “चलो, उस आदमी को पकड़ना है।”
कोच की ओर दौड़ते हुए समरजीत के दिमाग में सवाल घूम रहे थे – कौन था वह आदमी? औरत को खींचकर ले जाने की क्या वजह थी? अगर सावरी रावत, अभिराज की मां, अभी ट्रेन में है तो किस हालत में?
निशान और गवाह – सच्चाई की तरफ बढ़ते कदम
डी4 से डी5 की ओर बढ़े।
फर्श पर जूता पड़ा था, कोने में नीला कपड़े का टुकड़ा।
“सर, यह मम्मी की कुर्ती जैसा है।”
महिला घबराकर बोली – “अभी-अभी एक आदमी भागा है, किसी को घसीटते हुए ले जा रहा था, वह शायद रो भी रही थी।”
“किस तरफ गया?”
“गेट की तरफ, फिर अगले कोच में, हाथ में बड़ा बैग था, बैग हिल रहा था जैसे अंदर कुछ हो।”
अभिराज की आंखों से आंसू रुक नहीं पाए – “सर, वो मुझे लेकर भागा है। प्लीज बचा लो।”
समरजीत ने उसे सीने से लगा लिया – “मैं हूं ना, कुछ नहीं होने दूंगा।”
बीते अतीत की छाया – समरजीत की भावनाएं
समरजीत खुद समझ नहीं पा रहा था कि इस बच्चे के लिए इतनी मुलायमियत क्यों आ गई है।
शायद उसके डर में अपना गुजरा हुआ अतीत दिख रहा था – एक हादसा जिसने कभी उसकी आत्मा तोड़ दी थी।
अंतिम कोच – रहस्य और जाल
ट्रेन के आखिरी हिस्से में एसएलआर कोच था – जहां भारी सामान रखा जाता है।
वहीं से आवाज आई – लोहे की किसी चीज के पाड़ने की।
“यहीं है वह।”
दरवाजा खोला – अंदर अंधेरा, एक साया – टोपी वाला आदमी।
हाथ में बड़ा बैग, हिलता हुआ।
समरजीत को देखकर दौड़ लगा दी।
“रुक जा, पुलिस आ रही है, भाग नहीं पाएगा।”
वह आदमी अगले दरवाजे से कूदकर प्लेटफार्म की ओर भाग गया।
अभिराज चिल्लाया – “सर, बैग वहीं है।”
बैग फर्श पर पड़ा था, हल्का-हल्का हिल रहा था।
अंदर कोई था – लेकिन इंसान नहीं, एक गुड़िया थी।
बड़ी, भारी, इंसान जैसी; कपड़े वही नीली कुर्ती के थे।
“यह किसी को भ्रमित करने के लिए है। वह आदमी चाहता था कि हम सोचें कि तुम्हारी मां बैग में है ताकि असली दिशा में ध्यान ही ना जाए।”
सच्चाई का खुलासा – फुटओवर ब्रिज की ओर
स्टेशन मास्टर दौड़कर आया – “सर, प्लेटफार्म के सीसीटीवी में फुटेज मिला है। टोपी वाला आदमी किसी महिला को लेकर फुटओवर ब्रिज की तरफ गया है।”
“कौन सा ब्रिज?”
“प्लेटफार्म तीन वाला।”
समरजीत अभिराज को लेकर दौड़ पड़ा।
ब्रिज की सीढ़ियों पर पैरों के ताजा निशान थे, खून का छोटा दाग।
अभिराज – “सर, यह मम्मी के पैरों जैसे लगते हैं।”
समरजीत तेज कदमों से ऊपर चढ़ा।
ब्रिज के दूसरी तरफ अचानक किसी महिला की धीमी घुटी चीख।
“सर, यह मम्मी है।”
आखिरी संघर्ष – मां की तलाश
दबी हुई चीख की दिशा में दौड़ लगाई।
कॉरिडोर में ताजा घसीटने के निशान।
दरवाजा – आधा खुला, आधा टूटा।
अंदर पुराना सामान कमरा, कोने में टूटी खिड़की से हल्की रोशनी।
वहीं एक साया – टोपी वाला आदमी।
सामने जमीन पर महिला – हाथ बांधे, मुंह पर कपड़ा, आंखों में डर और पहचान।
“मम्मी!”
सांवरी रावत की आंखों में आंसू उमड़ आए।
टोपी वाला घबरा गया – “कोई पास मत आना।”
समरजीत – “जो करना है मुझसे कर, बच्चे और औरत को छोड़ दे।”
आदमी घबराया – “क्यों उठाया इस औरत को?”
“यह मुझे पहचान गई थी – एक साल पहले जब मैंने उसके पति के ऑफिस में चोरी की थी, यह वहीं काम करती थी। आज स्टेशन पर मिली तो समझ गया कि पुलिस तक पहुंच जाएगी।”
अंतिम मुठभेड़ – हिम्मत और जीत
समरजीत आगे बढ़ा।
आदमी पीछे हटने लगा, पैर रस्सी पर पड़ा, लड़खड़ा गया।
समरजीत ने उसकी बाह पर झपटा, जोरदार टक्कर।
सांवरी सुरक्षित, आदमी उठने की कोशिश – चाकू निकालने की कोशिश, समरजीत ने कलाई पकड़ दीवार से टकरा दी।
चाकू गिरा, आदमी गिरा, समरजीत ने हाथ मरोड़ कर कहा – “खत्म, अब तू गया।”
पुलिस अंदर घुस आई, उसे पकड़ लिया।
मां-बेटे का मिलन – भावनाओं की जीत
अभिराज भागकर मां के पास गया – “मम्मी, आप ठीक हो?”
सांवरी ने सिर कसकर पकड़ा – “मुझे लगा था, मैं तुझे फिर कभी नहीं देख पाऊंगी।”
दोनों रो पड़े।
समरजीत चौहान दीवार से टिककर गहरी सांस ली, आंखें थोड़ी नम।
स्टेशन मास्टर – “अगर आप नहीं होते तो पता नहीं क्या हो जाता।”
समरजीत – “बच्चा अकेला रो रहा था, ट्रेन रोककर खड़ा था, उसे छोड़कर कैसे जाता।”
सांवरी – “आपने मेरी जान बचाई। आपका एहसान कभी नहीं उतार पाऊंगी।”
समरजीत – “मैंने नहीं, आपके बेटे ने – उसने हिम्मत दिखाई। अगर वह ट्रैक पर खड़ा ना होता तो कोई उसे गंभीरता से नहीं लेता।”
अंतिम संदेश – हिम्मत की मिसाल
अभिराज – “सर, आप कल मिलोगे ना?”
समरजीत – “जब भी बुलाओगे, मैं आ जाऊंगा।”
एंबुलेंस के दरवाजे बंद हुए।
अभिराज – “थैंक यू सर, आप हीरो हो।”
समरजीत चौहान, जिसकी जिंदगी हजारों रेल लाइनों पर दौड़ती रही थी, पहली बार किसी एक बच्चे की आवाज में खुद को ढूंढ पाया।
उसने अपनी कैप सीधी की, पीछे मुड़कर चल दिया।
भीड़ में खोते हुए भी वह उस एक पल को हमेशा अपने दिल में रखेगा – जब एक छोटे बच्चे ने अपनी मां के लिए पूरी ट्रेन रोक दी और उसके एक वाक्य ने लोको पायलट को रुला दिया।
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मिलते हैं किसी नई कहानी में।
जय हिंद! वंदे मातरम।
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