विदेश के डॉक्टर हार गए थे, पर एक भिखारी बच्चे ने कहा —साहब, मैं आपकी पत्नी को ठीक कर सकता हूँ।

दुआ की ताकत – एक भूखे बच्चे का चमत्कार
कहते हैं, दुनिया में इलाज बहुत है पर दुआ सिर्फ कुछ दिलों में होती है। एक बड़े एयरपोर्ट के कोने में, अमीर आदमी संजय सिंघानिया अपनी बीमार पत्नी रीमा को व्हीलचेयर पर बैठाए खड़ा था। लंदन के अस्पताल, बड़े डॉक्टर, लाखों का इलाज – सब कोशिश कर चुका था वह। पर आज उसकी आंखों में बस एक सवाल था – क्या अभी कोई उम्मीद बची है?
भीड़ से निकलकर, नंगे पैर, फटे कपड़े, हाथ में स्टील की कटोरी लिए एक छोटा सा बच्चा आया। नाम था छोटू। उसने मासूम आवाज में कहा, “साहब, मैं आपकी मैडम को ठीक कर सकता हूं।” लोग हंसने लगे। पर उस बच्चे की आंखों में दवा नहीं, दुआ चमक रही थी। कभी-कभी भगवान मंदिरों में नहीं, छोटे हाथों में उतरता है।
संजय ने सोचा, जब बड़े डॉक्टर हार गए तो इस बच्चे की कोशिश भी देख लेते हैं। छोटू ने अपनी कटोरी जमीन पर रखी और रीमा के पास बैठ गया। उसने रीमा का हाथ अपने छोटे हाथों में लिया, आंखें बंद कीं और मन ही मन प्रार्थना करने लगा। आसपास लोग मुस्कुरा रहे थे, कोई मजाक उड़ा रहा था, पर छोटू के चेहरे पर एक अजीब सी पवित्रता थी।
कुछ ही देर बाद, रीमा की उंगलियों में हल्की सी हलचल हुई। संजय की आंखें आश्चर्य से फैल गईं। रीमा की पलकों में कंपन हुआ। छोटू मुस्कुराया – “देखा साहब, दुआ खाली नहीं जाती।”
संजय की आंखों से आंसू बह निकले। पहली बार उसे लगा, चमत्कार अस्पतालों में नहीं, फुटपाथ पर भी मिल जाते हैं। उसने छोटू से पूछा, “तुम्हारे पापा कहां हैं?” छोटू ने आसमान की तरफ देखा, “ऊपर हैं, लेकिन मैं रोज उनसे बात करता हूं।”
रीमा की हालत धीरे-धीरे बेहतर होने लगी। डॉक्टर ने चेकअप किया, रिपोर्ट देखी और हैरान रह गया – “यह मेडिकलली अप्रत्याशित है। रीमा जी की ब्रेन एक्टिविटी पहले से बेहतर है।” संजय फूट-फूट कर रो पड़ा। आज पैसा नहीं, एक भूखे बच्चे की सच्ची दुआ जीत गई थी।
संजय ने छोटू को गले लगाया – “आज से तुम मेरे साथ रहोगे। तुम्हें घर मिलेगा, खाना मिलेगा, स्कूल मिलेगा।” छोटू ने सिर झुका कर कहा, “साहब, अगर मैं आपके साथ चला गया तो जिनको दुआ चाहिए होगी उनका क्या?” संजय ने कहा, “बेटा, दुआ देना मत छोड़ना। पर जिंदगी भी जीनी है।”
तीनों एयरपोर्ट के मेडिकल रूम में गए। रीमा की आंखें खुल चुकी थीं, उसने छोटू का हाथ पकड़ कर कहा – “धन्यवाद बेटा।” भीड़ तालियां बजाने लगी, कुछ लोग रो दिए। छोटू अपनी कटोरी संजय को दे दी – “अब यह जरूरत किसी और की होगी, मेरी नहीं।”
छोटू ने आसमान की तरफ देखा, जैसे अपने पापा को सलाम कर रहा हो। उस दिन एयरपोर्ट की भीड़ में एक सच्चा चमत्कार हुआ था। संजय को पहली बार लगा, दुआ असल में पंख होती है।
सीख:
कभी किसी को छोटा मत समझना। क्योंकि कभी-कभी भगवान सबसे बड़ी मदद सबसे छोटे हाथों से करवाता है।
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