स्टेशन पर उदास बैठी || लड़की को सफाई करने वाला लड़का अपने घर ले गया

“नंदिनी की किस्मत”

मेरठ के रेलवे स्टेशन के बाहर एक बेंच थी, प्लेटफार्म से काफी दूर। सुबह से उस बेंच पर एक लड़की बैठी थी, जिसका चेहरा चिंता और उदासी से भरा था। उसका नाम नंदिनी था, और वह किसी का इंतजार कर रही थी। स्टेशन पर काम करने वाला लड़का अमित सुबह से ही उसे देख रहा था। शाम होते-होते अमित ने हिम्मत जुटाई और नंदिनी के पास जाकर पूछा, “मैडम, आप सुबह से यहां बैठी हैं, क्या हुआ? किसका इंतजार कर रही हो?” नंदिनी सहम गई, बोली, “तुमसे क्या मतलब? मैं किसी का भी इंतजार करूं, यहां बैठ सकती हूं।”

अमित ने विनम्रता से कहा, “मेरा मतलब बुरा नहीं था, बस देख रहा था आप परेशान लग रही हैं। अगर बताना नहीं चाहतीं तो कोई बात नहीं।” अमित अपनी ड्यूटी खत्म करके घर चला गया और मां को सब बताया। मां ने समझाया, “बेटा, कोई काम होगा या किसी का इंतजार कर रही होगी।”

अगले दिन अमित स्टेशन आया तो वही लड़की फिर उसी बेंच पर बैठी थी। उसके चेहरे पर रातभर जागने की थकान थी। अमित को लगा शायद उसके पास पैसे नहीं हैं, शायद भूखी भी है। वह फिर उसके पास गया, पूछा, “मैडम, क्या आप रातभर यहीं बैठी थीं?” नंदिनी की आंखों में आंसू आ गए। अमित ने उसे ढांढस बंधाया और बोला, “आंसू मत लाओ, बताओ क्या बात है?”

नंदिनी ने अपनी कहानी बताई – उसका नाम नंदिनी है, पास के एक शहर में रहती थी। पति दिल्ली में काम करते थे, कभी-कभार ही घर आते थे। एक दिन पति ने कहा, “दिल्ली में घर ले लिया है, अब वहीं चलेंगे, इस घर को बेच देते हैं।” घर बेच दिया, सारा पैसा पति के पास। स्टेशन पर आकर पति ने कहा, “मैं देखता हूं ट्रेन कब आएगी।” लेकिन पति अंदर गया और फिर लौटा ही नहीं। नंदिनी ने कई बार अंदर जाकर देखा, इंतजार किया, लेकिन पति का कोई पता नहीं। उसे समझ आ गया कि पति ने धोखा दिया है।

अमित ने पूछा, “अपने गांव चली जाओ, माता-पिता होंगे।” नंदिनी बोली, “माता-पिता नहीं रहे, घर अब भैया-भाभी का है, वे खुश नहीं रहते जब मैं जाती हूं, इसलिए वहां भी नहीं जा सकती।” उसने कहा, “कई बार सोचा था कि इस दुनिया से विदा ले लूं, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई।”

अमित घबरा गया, बोला, “ऐसी बातें मत सोचो। चलो मेरे घर, मेरी मां है, तुम्हें घर छोड़ दूंगा, शाम को बातें करेंगे।” नंदिनी ने डरते-डरते अमित के साथ जाने का फैसला किया।

अमित अपनी मां सरोज के पास नंदिनी को ले गया। मां ने पूछा, “यह कौन है?” अमित ने सारी बात बताई, कहा, “बेचारी भूखी है, इसे खाना दे दो।” सरोज ने नंदिनी को घर में जगह दी, खाना खिलाया। अमित ड्यूटी पर चला गया।

शाम को सब बातें करने बैठे। नंदिनी ने अपनी दुखभरी बातें बताईं, मां-बेटे हैरान रह गए। सरोज बोली, “बेटी, यह तेरा ही घर है, जितने दिन चाहे रह सकती है।” नंदिनी ने धन्यवाद दिया, बोली, “आजकल कोई दरवाजे की साइड भी बैठने नहीं देता, आपने घर में जगह दी।” सरोज बोली, “इंसान ही इंसान के काम आता है।”

नंदिनी को चैन की नींद आई, मां-बेटे भी आराम करने लगे। सुबह नंदिनी ने घर का सारा काम कर दिया था, सरोज ने पूछा, “बेटी, क्यों किया?” नंदिनी बोली, “अब आपके घर में हूं तो घर का काम करना चाहिए, वरना लगेगा बोझ हूं।” सरोज बोली, “बेटी, तू हमारी बेटी है।”

समय बीता, नंदिनी सरोज का खूब ख्याल रखने लगी। अमित खुश था कि मां का ख्याल रखने वाला कोई है। अमित और नंदिनी के बीच आदर-सम्मान का रिश्ता बन गया। एक दिन सरोज ने नंदिनी से पूछा, “बेटी, क्या तुम्हें मेरा बेटा अच्छा लगता है?” नंदिनी शरमा गई, बोली, “नहीं मां जी, ऐसी कोई बात नहीं।” सरोज हंसकर बोली, “अगर पसंद करती हो तो मैं तुम्हें बहू बनाने को तैयार हूं।”

शाम को सरोज ने अमित से शादी की बात की। अमित ने भी हामी भर दी – “मां जैसा ठीक लगे वैसा कर लो।” नंदिनी ने भी हां का इशारा कर दिया। दोनों एक-दूसरे को जीवनसाथी की तरह देखने लगे।

एक दिन नंदिनी सब्जी लेने गई, रास्ते में लॉटरी का टिकट देखा और खरीद लिया। घर जाकर बोली, “मां, गलती हो गई, टिकट ले लिया।” सरोज बोली, “कोई बात नहीं, देख लेते हैं, शायद तेरी लॉटरी लग जाए।” दोनों हंसने लगीं।

अगले दिन टीवी पर लॉटरी का नंबर आया। तीसरे और दूसरे नंबर पर टिकट नहीं लगा। सरोज टीवी बंद करने ही वाली थी कि फर्स्ट प्राइज का नंबर बताया – वही नंबर! एक करोड़ की लॉटरी लग गई! सरोज चिल्लाई, नंदिनी दौड़ी आई, दोनों गले लग गईं। अमित भी आया, रकम नंदिनी के अकाउंट में डलवा दी।

अब सरोज और अमित नंदिनी से शादी के लिए कुछ नहीं बोले, क्योंकि अब उसके पास करोड़ों रुपए थे। लेकिन 10-12 दिन बाद नंदिनी ने खुद कहा, “मां जी, अब मेरी और अमित की शादी करा दो।” सरोज ने पूछा, “सच में करना चाहती हो?” नंदिनी बोली, “मुझे अमित का व्यवहार बहुत अच्छा लगा, मैं उसी से शादी करना चाहती हूं।”

धूमधाम से शादी हुई। नंदिनी ने अपने पैसों से छोटा सा बिजनेस शुरू किया, अमित ने सलाह दी – “पैसे ऐसे ही रखेंगे तो खत्म हो जाएंगे, बच्चों के लिए भी काम आएं।”

किस्मत की खबर रमेश तक भी पहुंच गई। एक दिन वह नंदिनी से मिलने आया। नंदिनी ने शांति से पूछा, “अब क्या लेने आए हो?” रमेश बोला, “मुझसे गलती हो गई, अब तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं।” नंदिनी बोली, “क्यों, उस समय क्यों छोड़ गए थे?” रमेश ने बताया – दिल्ली में एक लड़की से प्यार हो गया था, उसी के लिए घर बेचा, लेकिन उसने भी धोखा दिया। अब जब लॉटरी लगी तो सोचा माफ कर देगी।

नंदिनी ने साफ मना कर दिया, बोली, “मेरी शादी हो चुकी है, दो बच्चे हैं, अब तुम्हारा कोई अधिकार नहीं। पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी, अब जाओ यहां से।” सरोज मुस्कुरा दी, अमित को भी खुशी हुई कि नंदिनी ने अपने दम पर सही फैसला लिया।

सीख:
यह कहानी बताती है कि किस्मत कभी भी पलट सकती है। जब सबकुछ खत्म लगने लगता है, तब भी उम्मीद और इंसानियत जिंदा रहती है। नंदिनी ने हिम्मत नहीं हारी, मुश्किलों का डटकर सामना किया, और अंत में अपना जीवन खुद के दम पर संवारा।

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मिलते हैं अगले वीडियो में, जय हिंद जय भारत!