Zaalem Man ne Apne batay or bahoo ko gar se nekal dia |sabaq Amoz kahani

मोहब्बत, पछतावा और नई उम्मीद – मेरी सास, देवरानी और मैं

मेरी शादी को सिर्फ तीन महीने ही गुजरे थे कि मेरे शौहर का इंतकाल हो गया। मैं उस सदमे में डूबी रही, लेकिन अपनी इद्दत के चार महीने अपने ही घर में गुजारे। उसके बाद मेरे मां-बाप मुझे लेने के लिए आए, मगर मैं उनके साथ नहीं गई, क्योंकि मैं उन पर मजीद बोझ नहीं डालना चाहती थी। मेरे वालिद की माली हालात पहले ही ठीक नहीं थे, और उन्होंने बड़ी मुश्किलों से मेरी शादी की थी।

मेरे ससुराल वाले अच्छे खासे अमीर थे। मेरी सास के सिर्फ दो बेटे और एक बेटी थी। मेरा शौहर, उसका छोटा भाई और एक ननंद। मेरे शौहर के इंतकाल के बाद मैं चाहती थी कि मेरी सास मेरी शादी अपने दूसरे बेटे से करवा दे। इसीलिए मैंने उनका दिल जीतने की बेशुमार कोशिशें की। घर के सारे काम खुद करती और रात को सोने से पहले सास के पांव भी दबाती। जितना हो सकता था, मैं उनकी खूब खिदमत करती ताकि वह एक बार फिर मुझे अपनी ही बहू बना लें।

मेरी ननंद शादीशुदा थी और बहुत कम हमारे घर आती थी क्योंकि उसकी शादी भी एक बड़े अमीर कबीर घराने में हुई थी। जब भी वह आती, मैं उसके दिल से मेहमान नवाज़ी करती। उसकी पसंद के अच्छे-अच्छे पकवान बनाती और उसके बच्चों का खास ख्याल रखती। मेरी सास इस बात से बहुत खुश होती और मुझे ढेरों दुआएं देती। कहती, “मेरी दुआ है कि मेरी दूसरी बहू भी इतनी ही अच्छी हो जितनी तुम हो। तुम बिल्कुल मेरी बेटी की तरह हो। जिस तरह तुम मेरी खिदमत करती हो, उस तरह तो कोई बेटी भी अपनी मां की खिदमत नहीं करती।”

मैं हर तरह से अपनी सास का दिल जीतना चाहती थी, क्योंकि हमारे घर में सिर्फ उन्हीं का हुक्म चलता था। हर फैसला उनकी मर्जी से होता। अगर कोई बात उनको बुरी लग जाती तो उसका जिक्र भी घर में कोई ना करता, क्योंकि वह सख्त मिजाज खातून थीं और उनके आगे परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। वो मुझसे इतनी खुश थीं कि मुझे यकीन हो गया था कि वह मेरे देवर का निकाह मेरे साथ जरूर कर देंगी।

मेरा देवर लंदन में डॉक्टर बनने की तालीम हासिल कर रहा था। उसके वापस आने में सिर्फ तीन महीने ही रह गए थे और मैं दिल ही दिल में खुश थी कि एक बार फिर यह घर मेरा हो जाएगा और मैं इस घर की मालकिन बन जाऊंगी। क्योंकि मैंने अपनी पूरी जिंदगी गुरबत में गुजारी थी और यहां आकर मुझे जिंदगी की असल असाइशों का पता चला था। मैं यह सब कुछ अपने हाथों से खोना नहीं चाहती थी।

मेरा ससुराल वाकई बहुत अमीर था। उनके पास बाप-दादा की जमीनें थीं, और यह खानदानी दौलतमंद लोग थे। मेरा देवर शक्ल सूरत में निहायत खूबसूरत था। मैं उससे शादी करके अपनी सास की तरह इस घर पर अपनी गिरफ्त मजबूत करना चाहती थी। मुझे इल्म था कि तभी मुमकिन है जब वह मुझसे शादी करें, क्योंकि मेरी सास और ससुर अपने उस बेटे की हर बात मानते और हर मामले में उससे मशवरा करते।

मेरा पहला शौहर आम शक्ल सूरत का था और ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं था। उसको बचपन में एक बीमारी हो गई थी, जिसका इल्म पूरे खानदान को था। मगर मेरी सास ने यह बात मेरे वालिद से छुपाई क्योंकि वह जानती थीं कि अगर मेरे वालिद को पता चलता तो वह कभी मेरा रिश्ता वहां ना करते। मेरे वालिद लालम थे, इस चीज से बखबर थे। इसलिए मेरी सास ने यह रिश्ता करवा दिया और मैं इस घर में आ गई। मगर मौत को कौन टाल सकता है?

मेरी शादी को तीन महीने हुए थे कि मेरे शौहर की तबीयत अचानक बिगड़ गई। मेरी सास ने उनके इलाज पर बहुत पैसा लगाया। वो उन्हें दूसरे मुल्क भेजना चाहती थीं। मगर वक्त कम था और चंद दिनों में वह दुनिया छोड़ गए। शौहर के इंतकाल के बाद मैंने पूरे एक साल तक अपनी सास और ननंद की खिदमत की और घर को संभाला। मगर उस दिन मुझे बहुत दुख हुआ जब मेरी सास ने कहा कि अब मैं अपने छोटे बेटे के लिए लड़की ढूंढूंगी और उसकी शादी कर दूंगी।

मैं दिल ही दिल में सोच रही थी कि मैं जो दिन-रात उनके आगे नौकरानी बनी फिरती हूं, मेरी सारी मेहनत रायगां जाएगी और मैं ऐसा हरगिज़ नहीं होने दूंगी। एक दिन मैं और मेरी सास शहर की मशहूर दरगाह बीवी पाक दामन गए, क्योंकि वह हर जुमेरात को वहां जाती थीं। जैसे ही हम वहां पहुंचे तो एक नौजवान नबीना लड़की बेकार बनी बैठी थी। उसे देखकर मेरी सास बहुत परेशान हो गईं। वो उसके पास जाकर बैठ गईं और पूछने लगीं कि तुम नबीना कैसे हो गई हो और यहां क्या कर रही हो?

वो उससे इस तरह बातें कर रही थीं जैसे उसे पहले से जानती हों। मैं यह सब देखकर हैरान थी। मेरी सास उस लड़की से माफी मांग रही थीं और उसे अपने साथ चलने का कह रही थीं। वह नबीना लड़की उनसे कह रही थी कि मैं आपके साथ हरगिज़ नहीं जाऊंगी। मेरे साथ जो कुछ हुआ है, वह आपकी वजह से हुआ है और मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी। मेरी सास रोते हुए कह रही थीं कि अब तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी होगी, बस तुम मेरे साथ चलो। आखिरकार वो लड़की उनके साथ हमारे घर आने में मान गई।

मैंने सास से पूछा कि यह कौन है और आप उसे घर क्यों लाई हैं? तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि मैं अपने बेटे आरिफ की शादी इससे करूंगी। यह सुनकर मेरे पैरों तले से जमीन निकल गई, क्योंकि मैंने जो ख्वाब देखे थे, वो सब टूटते हुए नजर आ रहे थे। सास ने यह कहकर वाज कर दिया कि इस बारे में मुझसे कोई सवाल ना किया जाए।

मुझे हैरत थी कि वह एक नबीना भिखारण को अपने डॉक्टर बेटे के लिए कैसे पसंद करती हैं। और मैं यह भी सोच रही थी कि मेरा देवर तो उसे देखते ही इंकार कर देगा, क्योंकि वह लंदन में पढ़ता था और उसकी पसंद भी यकीनन किसी पढ़ी-लिखी लड़की की होगी। वो किसी नबीना लड़की से शादी कैसे करेगा? मगर मेरी सास ने यह बात उससे छुपाई कि जिस लड़की से उसकी शादी करने जा रही हैं, वह नबीना है। मैंने बहुत कोशिश की कि अपने देवर को यह हकीकत बता दूं, मगर सास ने सख्ती से मना कर दिया कि आरिफ को इस बारे में कुछ नहीं पता चलना चाहिए।

जब निकाह का वक्त आया और मेरा देवर आरिफ उस लड़की को देखकर बहुत खुश हुआ तो मैं हैरान रह गई कि आखिर वो इतना खुश क्यों है। एक नबीना लड़की उसकी बीवी बनने जा रही है और फिर भी वह खुश है। मेरी परेशानी बढ़ती ही चली जा रही थी क्योंकि मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

निकाह मुकम्मल हुआ और मेरी आंखों के सामने वह अपनी बीवी का हाथ पकड़कर अपने कमरे में चला गया। मेरे सारे ख्वाब टूट कर रह गए। फिर मेरी सास ने मुझे हुक्म दिया कि आरिफ और उसकी बीवी की सारी जिम्मेदारी अब मेरी है, क्योंकि वह अंधी है। उसे कुछ नजर नहीं आता। उसके खाने-पीने से लेकर हर काम तक, सब जिम्मेदारी मेरी है। यह सोचकर मेरा दिल जल उठा कि मैंने पहले अपनी सास की खिदमत की और अब देवरानी की नौकरी करूं।

मैंने हिम्मत करके उस दिन सास से बात करने का फैसला किया और उनके कमरे में चली गई। मैंने कहा, “अम्मी जान, आपने मेरे बारे में क्या सोच रखा है कि आप मुझे हमेशा नौकरानी बनाकर रखेंगी? पहले तो आप थीं। अब आपने यह नबीना लड़की भी मेरे सर पर सवार कर दी है। मैंने अपने शौहर की मां होने की वजह से आपकी दिलो-जान से खिदमत की, लेकिन अब मैं उस लड़की की खिदमत नहीं कर सकती।”

मेरी सास ने नरमी से कहा, “आकर मेरे पास बैठो। मैं तुम्हें सब बताती हूं।” मेरा दिल नहीं मान रहा था, लेकिन मजबूरी थी। मैं उनके पास जाकर बैठ गई। उन्होंने बताया कि यह बात उस वक्त की है जब आरिफ लंदन नहीं गया था। वह कहने लगीं, “यह लड़की हमारे ही मोहल्ले में रहती थी और आरिफ इसे दिलो-जान से चाहता था। यह लड़की भी आरिफ को पसंद करती थी। खानदान के लोग कई बार मुझे कह चुके थे कि मैं उसका रिश्ता लेकर जाऊं, मगर मैं आरिफ का रिश्ता एक अमीर घराने में करना चाहती थी। मैंने पैसे को इंसान की खुशियों से बड़ा समझा। सबने समझाया, मगर मैं ना मानी।

एक दिन मैं उस लड़की के घर गई और उसके वालिदैन से कहा कि अपनी बेटी को आरिफ से दूर रखें वरना अच्छा नहीं होगा। मैंने उन पर इल्जाम लगाया कि वह मेरे पैसों और जायदाद पर नजर रखे हुए हैं। उसकी मां ने रोते हुए कहा, “हम गरीब जरूर हैं, लेकिन इज्जत वाले हैं। हमने अपनी बेटी को कभी नहीं कहा कि वह आपके बेटे के करीब जाए।” मोहल्ले के लोग यह सब देख रहे थे और उनकी इज्जत खराब हो रही थी। उसने मुझे कहा, “हम आइंदा अपनी बेटी को आरिफ से नहीं मिलने देंगे।”

मैं वापस आई तो आरिफ ने मुझसे बात नहीं की। मैंने उसे खाने के लिए बुलाया मगर उसने मना कर दिया। आरिफ की यह बेरुखी मेरे लिए नाकाबिले बर्दाश्त थी, क्योंकि वह हमेशा मेरी एक पुकार पर मेरे पास आता था। यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि उस लड़की ने उसे फोन पर सब बता दिया था कि मैं उनके घर गई थी।

अगली सुबह आरिफ घर से निकलने लगा तो मैंने पूछा, “कहां जा रहे हो?”
उसने कहा, “मैं नीलम से मिलने जा रहा हूं।”
मैंने उसे रोका, कहा कि मैं उस गरीब लड़की से तुम्हारी शादी हरगिज़ नहीं होने दूंगी। वो सिर्फ तुम्हारे पैसों पर नजर रखती है। आरिफ मेरी बात सुने बगैर चला गया। जब वापस आया तो झाड़ू का कतार हो रहा था। वो कमरे में चला गया और हर चीज तोड़ दी। मैंने दरवाजा खटखटाया मगर उसने जवाब ना दिया। सारा दिन खाना नहीं खाया।

यह हालत देखकर मेरा दिल कटने लगा, क्योंकि मैं उसे जान से ज्यादा चाहती थी। वह पहले ही बीमार था और अब मैं उसे यूं बर्बाद नहीं देख सकती थी। मैं चाहती थी कि किसी तरह उस लड़की को आरिफ की जिंदगी से निकाल दूं। इसीलिए मैं दोबारा नीलम के घर गई और उसके वालिदान से कहा कि अपने बेटे का पीछा छोड़ दें और उसकी जिंदगी से निकल जाएं। नीलम के वालिदान ने वादा किया कि वह आज यह शहर छोड़ देंगे। नीलम ने भी कहा कि हमें आपके पैसे नहीं चाहिए। हम यह शहर छोड़कर जा रहे हैं। आप अपने बेटे को समझा दें कि हमारा पीछा ना करें। उसने कहा कि उसकी खुशियों का फैसला उसकी मां करेगी और आपके बेटे को यह समझना चाहिए कि उसकी मां को उसकी खुशियां अजीज नहीं हैं।

मैंने जवाब दिया कि मुझे तुम्हारी बातों की कोई परवाह नहीं। बस जल्दी यहां से निकल जाओ। उसके बाद मैं घर लौटी तो आरिफ की हालत और खराब हो चुकी थी। वो खाना-पीना छोड़ चुका था। एक दिन वह बेहोश होकर गिर पड़ा और बेहोशी में सिर्फ नीलम का नाम ले रहा था। उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि काश मैंने उन दोनों की शादी कर दी होती तो आज यह नौबत ना आती।

मेरा बेटा अस्पताल में था। जब उसे होश आया तो रोते हुए कहने लगा, “अम्मी, मुझे नीलम के पास जाना है। खुदा के लिए मुझे उससे मिला दे।” मैंने उसे कहा, “बेटा, जैसे ही तुम ठीक हो जाओगे, मैं तुम्हारा रिश्ता लेकर उसके घर जाऊंगी और तुम्हारी शादी नीलम से कर दूंगी।” यह खबर सुनने के बाद आरिफ थोड़ा खुश होने लगा और कुछ ही दिनों में वो बिल्कुल ठीक हो गया। जब हम घर वापस आए तो आरिफ फिर से नीलम से मिलने गया और बहुत मायूस होकर घर वापस आया।

आरिफ ने मुझे आकर बताया, “अम्मी, अब तो आप भी मान गई थीं। अब तो आप भी राजी हो गई थीं कि मेरी शादी नीलम के साथ करवा देंगी। पर पता नहीं क्यों नीलम और उसके घर वाले शहर छोड़कर कहां चले गए हैं। उनका नंबर भी बंद जा रहा है। अब मैं उनको कहां ढूंढूंगा। पता नहीं वह लोग कहां चले गए हैं। इस मोहल्ले में काफी लोगों से पूछा मगर किसी को भी नहीं पता कि वह लोग आखिर कहां गए हैं। क्योंकि जानती तो मैं भी नहीं थी कि वह लोग आखिर कहां गए।”

आरिफ ने पूरे छह महीने नीलम को तलाश किया मगर उसे कहीं भी नहीं मिले। आखिर वह मायूस होकर आरिफ को यह बात कबूल करनी पड़ी कि अब वह उसे कहीं भी नहीं मिलेगी। आरिफ ने यह फैसला किया कि वह मुल्क छोड़कर चला जाएगा और कभी भी वापस नहीं आएगा। आरिफ का यह फैसला सुनकर मैं बहुत उदास हो गई और अपने किए पर बहुत पछताने लगी कि मैंने आखिर ऐसा क्यों किया। अगर उसकी शादी नीलम के साथ करवा देती तो कम से कम मेरा बेटा मेरी आंखों के सामने रहता और यह मुल्क छोड़कर कभी ना जाता।

मैंने आरिफ को समझाने की बहुत कोशिश की। उसे रोकने की कोशिश की। मगर उसने मेरी एक बात भी ना मानी। उसने कहा कि मैं नीलम के बिना बिल्कुल नहीं रह सकता और उस मुल्क में रहकर मुझे नीलम की याद जरूर आएगी। ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं अपने शहर में रहूं और आते-जाते नीलम के घर की तरफ ना देखूं और उसकी याद मुझे ना आए। मेरा जीना बहुत मुश्किल हो गया है।

यह सारी बातें बताकर आरिफ बहुत रोया और मैं अपने किए पर बहुत पछताई कि मैंने अपनी जिंदगी में आकर अपने बेटे की खुशियां बर्बाद कर दीं। अगर मैं उसकी शादी नीलम के साथ कर देती तो आज वह कितना खुश होता। मेरी वजह से उसकी आंखों में आंसू थे। उसके बाद आरिफ लंदन चला गया और मैंने नीलम की तलाश जारी रखी। मैंने नीलम के सारे रिश्तेदारों से भी कह दिया कि अगर आप लोगों को कभी भी नीलम या उसके घर वालों का कुछ पता चले तो मुझे जरूर बता दें। अजीब बात यह थी कि किसी को भी उनके बारे में कुछ भी पता नहीं था कि आखिर वो लोग गए कहां।

उसके बाद मैं हर जुमेरात बीवी पाक दामन के दरबार पर जाती और दुआ करती कि मेरे बेटे की खुशियां मुझे वापस मिल जाएं और वह नीलम के साथ मिल जाए। मेरी दुआएं कबूल हुईं और मुझे नीलम बीवी पाक दामन के ही दरबार पर मिल गई। मैंने जब उसे वहां देखा तो मैं बहुत खुश हुई और उसे लेकर अपने घर आ गई।

नीलम ने मुझे बताया कि जिस रात वह लोग यह शहर छोड़कर जा रहे थे, उसी रात उनका एक बहुत बुरा हादसा हो गया था और उस हादसे में उसके दोनों मां-बाप की मौत हो गई थी और नीलम नबीना हो गई थी। यह बात सुनकर मैं बहुत रोई, क्योंकि उसके साथ यह सब कुछ मेरी ही वजह से तो हुआ था। अगर मुझसे यह शहर छोड़ने के लिए ना कहती, तो इतना बड़ा हादसा उनके साथ ना होता।

फिर मैंने फैसला किया कि मैं कुछ ही दिनों में नीलम की शादी आरिफ के साथ कर दूंगी। आरिफ जैसे ही वापस आया तो वह नीलम को देखकर बहुत खुश हुआ। आरिफ को खुश देखकर मैं भी बेफिक्र हो गई, क्योंकि मुझे एक पल भी अपनी जिंदगी में सुकून महसूस नहीं होता था। मेरे पास बहुत पैसा था, जिंदगी की हर असाइश मौजूद थी, अल्हम्दुलिल्लाह, मगर उनकी खुशी मेरे लिए सब चीजों से ज्यादा थी।

वो मुझे कह रही थी, “बेटी, मुझे पता है कि तुम्हारे दिल में क्या था और तुम क्या चाहती थी। मगर मैं मजबूर थी। मैं वैसा कभी नहीं कर सकती थी जैसा तुम चाहती थी। तुम मेरी बेटी हो। तुमने जिस तरह मेरी खिदमत की है उसका अजर तो तुम्हें अल्लाह ही देगा। अगर तुम शादी करना चाहती हो, मुझे बता दो। मैं तुम्हारे लिए अच्छे से अच्छा रिश्ता देखकर तुम्हारी शादी किसी ऊंचे खानदान में कर दूंगी। मेरी खुशी सिर्फ तुम्हारे साथ है।”

उस रात उन्होंने कहा था कि मेरे पास जितनी भी दौलत है, मैं अपनी सारी दौलत के दो हिस्से करूंगी। उसमें से एक हिस्सा तुम्हारा और एक आरिफ का होगा। अगर बेटी तुम्हें अपनी जिंदगी का कोई फैसला लेना है, तो तुम्हें पूरा हक है। तुम जो भी कहोगी, मैं वैसा ही करूंगी।

अपनी सास की सारी बातें सुनकर मुझे उस वक्त एहसास हुआ कि मैं जो कुछ भी सोच रही थी, बहुत गलत सोच रही थी। मेरे दिल में भी दौलत का लालच इतना बढ़ गया था कि मुझे अपने घर वालों का प्यार भी नजर नहीं आ रहा था। अगर वह चाहते तो अपने बेटे की मौत के बाद मुझे मेरे मायके भेज सकते थे। मगर उन लोगों ने मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं किया और मेरी सास ने मुझे अपनी बेटी बनाकर अपने पास रखा।

मैंने उस वक्त अपनी सास को कह दिया, “नहीं अम्मी जान, मैं अपनी पूरी जिंदगी आपके साथ ही गुजारूंगी। इस घर में जितनी खुशी मुझे मिली है, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी जिंदगी में इतनी खुशियां और इतना सुकून होगा। आपने जितना कुछ मुझे दिया है, मेरे लिए तो यह भी बहुत है। मुझे मजीद की ख्वाहिश नहीं है।”

मेरी सास ने उसी वक्त मुझे गले से लगा लिया और कहा, “तुम मेरी बेटी हो और हमेशा मेरी बेटी रहोगी।” उस बात से मुझे बहुत खुशी मिली। मैंने उसी वक्त सास से कहा, “अम्मी जान, मैं आरिफ और उसकी बीवी को उनके कमरे में खाना देकर आती हूं। अब आप उन दोनों की फिक्र मत किया करें। मैं ही अपनी देवरानी का ख्याल रखूंगी। उसकी आंखें नहीं हैं तो क्या हुआ? मेरे लिए बहन जैसी है। मैं उसे कभी इस बात का एहसास नहीं होने दूंगी कि उसे कुछ नजर नहीं आता। मैं उसका बहुत ख्याल रखूंगी।”

मेरी सास ने मेरे सर पर हाथ रखकर मुझे दुआ देते हुए कहा, “मेरी बेटी, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी।”
मैं जैसे ही खाना-दूध लेकर आरिफ के कमरे में गई तो वहां तीन और डॉक्टर बैठे हुए थे और आरिफ उनके साथ नीलम की ही बात कर रहा था, “मैं जिस लड़की के बारे में आप लोगों को बताता था, यही है वह नीलम जिससे मैं बहुत मोहब्बत करता था और आज शुक्र है अल्लाह का कि नीलम मुझे मिल गई है और उसका साथ पाकर मैं बहुत खुश हूं।”

मुझे तो अपनी किस्मत पर यकीन नहीं आ रहा था कि मुझे अपनी मोहब्बत हासिल हो गई है। आरिफ के दोस्त जो डॉक्टर थे, वह आरिफ से कह रहे थे कि तुम नीलम को लंदन लेकर आओ। हम उसका वहां ऑपरेशन कराएंगे और फिर नीलम की आंखें वापस आ जाएंगी। यह बात सुनकर मुझे भी बहुत खुशी हुई कि उसकी आंखों की रोशनी एक बार फिर वापस आ जाएगी और फिर हम दोनों जेठानी-देवरानी इस घर में खुशी से जिंदगी गुजार सकेंगी।

सीख:
कभी-कभी इंसान मोहब्बत और दौलत के बीच उलझ जाता है, मगर असली खुशी अपनों के साथ ही है। पछतावे के आंसू और नई उम्मीद की रोशनी ही जिंदगी को खूबसूरत बनाती है।