होली के दिन पति ने पत्नी से परेशान होकर कर दिया कारनामा/वजह जानकर S.P के होश उड़ गए/

अजराडा का ह/त्याका/ंड: लालच, बेवफाई और प्रतिशोध की खौफनाक दास्तान
उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला अपनी ऐतिहासिकता के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी जिले के अजराडा गाँव में एक ऐसी घटना घटी जिसने मानवता को झकझोर कर रख दिया। यह कहानी है कृष्णपाल और उसकी पत्नी कुणाली की, जिनका जीवन खुशियों से भरा था, लेकिन न/शे की लत और ग/लत रास्तों के चुनाव ने सब कुछ राख कर दिया।
कृष्णपाल: एक मेहनती म/जदू/र का पतन
अजराडा गाँव के खेतों में कृष्णपाल की मेहनत की मिसाल दी जाती थी। वह गाँव के बड़े जमींदारों के यहाँ काम करता था। उसकी कद-काठी मजबूत थी और वह दिन भर पसीना बहाकर अच्छे पैसे कमा लेता था। गाँव वाले उसकी ईमानदारी की तारीफ करते थे। लेकिन वक्त बदला और कृष्णपाल की संगत भी बदल गई।
गाँव के कुछ आवारा लड़कों के साथ बैठकर उसने “शौकिया” तौर पर श/राब पीना शुरू किया। वह शौक कब लत बन गया, उसे पता ही नहीं चला। अब कृष्णपाल काम पर कम और श/राब के ठेके पर ज्यादा दिखने लगा। उसकी मेहनत की जगह अब न/शे की बदबू ने ले ली थी। नतीजा यह हुआ कि जमींदार ने उसे काम से निकाल दिया। अब कृष्णपाल घर पर खाली बैठने लगा और उसकी झुंझलाहट उसकी पत्नी कुणाली पर निकलने लगी।
कुणाली: खूबसूरती और असुरक्षा का भंवर
कुणाली गाँव की सबसे खूबसूरत महिलाओं में से एक थी। वह एक समर्पित गृहणी थी, लेकिन जब उसने देखा कि उसका पति न/शे का गुलाम हो चुका है, तो उसके मन में असुरक्षा की भावना पैदा होने लगी। घर में राशन खत्म हो रहा था और ऊपर से कृष्णपाल की रोज की मा/रपी/ट।
एक दिन कृष्णपाल ने कुणाली को इतना पीटा कि उसकी चीखें पड़ोसियों तक पहुँच गईं। तभी वहाँ अमर सिंह नाम का एक ट्रक ड्राइवर पहुँचा। अमर सिंह का चाल-चलन पहले से ही ठीक नहीं था, लेकिन उस दिन उसने “मसीहा” बनकर कुणाली का पक्ष लिया। उसने कृष्णपाल को ध/मकी दी, “अगर आज के बाद इस पर हाथ उठाया, तो हाथ पैर तोड़ दूँगा।”
कुणाली को लगा कि उसे एक सहारा मिल गया है। लेकिन उसे नहीं पता था कि यह सहारा उसे दलदल की ओर ले जा रहा है।
ग/लत रास्तों का चुनाव और गुप्त संबं/ध
कृष्णपाल ने अपने दोस्त शिवकुमार की मदद से पेट्रोल पंप पर नौकरी तो शुरू कर दी, लेकिन उसका मन काम में नहीं लगता था। इसी बीच कुणाली और अमर सिंह के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं। जब कृष्णपाल पंप पर ड्यूटी कर रहा होता, अमर सिंह कुणाली के घर आने लगा।
15 जनवरी, 2026 की उस मनहूस शाम को कुणाली अमर सिंह के घर ₹1000 उधार लेने गई थी। अमर सिंह ने उसे पैसे तो दिए, लेकिन बदले में उसकी मर्या/दा की मांग की। कुणाली, जो पहले ही अभावों और पी/ड़ा से टूट चुकी थी, उसने समर्पण कर दिया। यहीं से ग/लत रिश्तों का एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसका अंत खु/नी होना तय था।
शिवकुमार: वफादारी और बेवफाई के बीच
कृष्णपाल का दूसरा दोस्त शिवकुमार, जो कृष्णपाल को अक्सर न/शे की हालत में घर पहुँचाता था, वह भी इस खेल में शामिल हो गया। एक रात जब वह कृष्णपाल के गिरे हुए पैसे लौटाने आया, तो कुणाली ने उसकी ईमानदारी और शराफत का फायदा उठाकर उसे भी अपने जा/ल में फंसा लिया। अब कुणाली के दो प्रेमी थे—अमर सिंह और शिवकुमार। वह इन दोनों से पैसे लेती और उनके साथ अपना व/क्त गुजारती।
जि/स्मफरो/शी का काला कारोबार
अमर सिंह का लालच अब और बढ़ गया था। उसने देखा कि कुणाली पैसों के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। उसने अपने दोस्त अजय को बुलाया और कुणाली को प्रलोभन दिया, “अगर तुम मेरे यहाँ ग्राहक के साथ व/क्त गुजारो, तो हम मोटी कमाई करेंगे।” कुणाली ने इसे एक ‘धंधा’ मान लिया। वह अब गाँव की एक साधारण बहू नहीं, बल्कि एक दे/ह व्या/पारी बन चुकी थी। अमर सिंह ग्राहक लाता और कुणाली उनके साथ कमरे में जाती। कमाई आधी-आधी बंट जाती थी।
होली का दिन: सं/हार का त्यौहार
3 मार्च, 2026 को पूरे देश में होली की खुशियाँ मनाई जा रही थीं, लेकिन अजराडा में श्मशान जैसी शांति छाने वाली थी। अमर सिंह ने कुणाली को अपने घर बुलाया था। शिवकुमार ने जलन (Jealousy) वश यह सब देख लिया और सीधा कृष्णपाल के पास पहुँचा। उसने कृष्णपाल के कान भरे, “तेरी पत्नी इस समय अमर सिंह के कमरे में है।”
कृष्णपाल का खून खौल उठा। उसने मौके पर पहुँचकर हंगामा किया। पड़ोसियों ने कुणाली को वापस घर भेजा। घर पहुँचकर कृष्णपाल ने एक डरावनी चुप्पी साध ली। उसने कुणाली से कहा, “मैं सब भूलने को तैयार हूँ, बस मुझे माफ कर दो। तुम मेरे लिए खाना बनाओ, मैं अभी आता हूँ।”
वह खौफनाक अंत
कृष्णपाल बाहर गया और न/शे की एक बोतल गटक ली। वह घर लौटा और सीधे रसोई में गया। उसने कुणाली को बालों से पकड़कर घसीटा और कमरे में ले गया। उसने कुणाली के हाथ-पैर अपनी ही चुन्नी से बांध दिए।
वह वापस रसोई में गया और लोहे का एक चिमटा चूल्हे की आग पर रख दिया। जब चिमटा बिल्कुल लाल (Red hot) हो गया, तो वह कमरे में आया। कुणाली रो रही थी, गिड़गिड़ा रही थी, “कृष्णपाल, मुझे माफ कर दो! मैं अब कभी ऐसा नहीं करूँगी!”
लेकिन न/शे और प्रतिशोध में पागल कृष्णपाल ने कुछ नहीं सुना। उसने उस दहकते हुए चिमटे को कुणाली के संवेदनशील अंगों (Sensitive parts) में डाल दिया। कुणाली की रूह कंपा देने वाली चीखें बाहर तक गईं, लेकिन कृष्णपाल तब तक नहीं रुका जब तक कुणाली का शरीर शांत नहीं हो गया। वह तड़प-तड़प कर म/र गई।
कानून का अं/जाम
दरवाजा तोड़कर जब पड़ोसी अंदर आए, तो मंजर देख सबकी रूह कांप गई। पुलिस ने कृष्णपाल को रंगे हाथों गिर/फ्तार किया। जेल की सलाखों के पीछे कृष्णपाल ने कहा, “साहब, मैंने उसे जान से मा/रकर अपने घर का क/लंक धो दिया है।”
अदालत में आज भी यह मामला चल रहा है। यह घटना आज भी अजराडा के लोगों के लिए एक डरावना सपना है, जो याद दिलाती है कि न/शा और अनैतिकता किस कदर इंसान को जानवर बना देती है।
निष्कर्ष: समाज में ऐसे अपराध हमें सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर ग/लत कौन था? वह श/राबी पति, वह भ/टकी हुई पत्नी, या वह लालची दोस्त? शायद ये सभी उस पतन का हिस्सा थे जिसने एक जान ले ली।
जय हिंद।
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