”ये मेरी माँ की फोटो आपके घर में क्यों है ” भिखारी लड़की ने एक करोड़पति के घर में दीवार पर लगी

मन्नत विला की खोई परी
मुंबई के जूहू इलाके में समंदर किनारे मन्नत विला अपनी चमक-दमक और शानो-शौकत के लिए मशहूर था। इसी बंगले में रहते थे यशवर्धन—शहर के सबसे बड़े बिजनेस टायकून, जिनकी उम्र करीब 40 साल थी। दौलत के मामले में वह कुबेर थे, लेकिन दिल के मामले में दुनिया के सबसे गरीब इंसान। दस साल पहले एक भयानक एक्सीडेंट ने उनकी दुनिया उजाड़ दी थी। उन्होंने अपनी पत्नी सुमन और एक साल की बेटी परी को खो दिया था। उस हादसे ने उन्हें पत्थर बना दिया था। वे हंसना भूल चुके थे। हजारों करोड़ की संपत्ति, सैकड़ों नौकर, लेकिन घर में सिर्फ तन्हाई और यादें।
आज सुमन की दसवीं बरसी थी। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जैसे आसमान भी यशवर्धन के दुख में रो रहा हो। घर के बड़े हॉल में सुमन की आदमकद तस्वीर लगी थी, जिस पर ताजे फूलों की माला चढ़ाई गई थी। नौकरों ने पूरे घर को सजाया था, क्योंकि शहर के बड़े-बड़े लोग श्रद्धांजलि देने आने वाले थे। यशवर्धन अपने कमरे में बैठे, खिड़की से बाहर उफनते समंदर को देख रहे थे। उनका वफादार मैनेजर और दूर का रिश्तेदार रंजीत कमरे में आया। चालाक और लालची रंजीत की नजर यशवर्धन की जायदाद पर थी, क्योंकि उनका कोई वारिस नहीं था।
रंजीत ने कहा, “भाई साहब, मेहमान आने शुरू हो गए हैं। आपको नीचे चलना चाहिए।” यशवर्धन ने गहरी सांस ली और हॉल की तरफ चल दिए।
बारिश में भीगती एक छोटी बच्ची
उसी वक्त बंगले के बाहर सड़क पर बारिश के पानी में घुटनों तक डूबी एक दस साल की लड़की—चुटकी—भीग रही थी। वह अनाथ थी, सड़क किनारे भिखारियों के साथ रहती थी। उसके बदन पर फटे कपड़े, उलझे हुए बाल, चेहरे पर धूल-मिट्टी। दो दिन से भूखी थी। बारिश की ठंड उसे कपा रही थी, लेकिन पेट की आग उससे ज्यादा तेज थी। उसने मन्नत विला के गेट पर जलती रोशनियां देखीं। उसे लगा कि शायद आज यहां कुछ खाने को मिल जाए।
वह कांपती हुई गेट पर पहुंची। गार्ड ने उसे डंडे से डराया, “चल भाग यहां से। यहां बड़े लोग आ रहे हैं। भीख नहीं मिलेगी।” चुटकी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “अंकल, बहुत भूख लगी है। दो दिन से कुछ नहीं खाया। बस थोड़ा सा दे दो।” गार्ड का दिल नहीं पसीजा। उसने उसे धक्का दे दिया। चुटकी कीचड़ में गिर पड़ी, घुटने छिल गए।
यह नजारा यशवर्धन ने अपनी बालकनी से देख लिया। उसके दिल में एक अजीब सी टीस उठी। शायद आज सुमन की बरसी थी, इसलिए उसका दिल थोड़ा नरम था। यशवर्धन ने इंटरकॉम पर गार्ड को डांटा, “राम सिंह, उसे अंदर आने दो। भगाओ मत। उसे किचन के रास्ते अंदर लाओ और कुछ खिलाओ।” गार्ड हैरान रह गया, लेकिन मालिक का हुक्म था। उसने चुटकी को उठाया, “चल, तेरी किस्मत चमक गई। साहब ने बुलाया है।”
महल के अंदर एक भूखी परी
चुटकी डरते-डरते, सहमी-सहमी उस विशाल महल के अंदर दाखिल हुई। उसने अपनी जिंदगी में इतना बड़ा घर कभी नहीं देखा था। ऊंची छतें, झूमर, चमकते फर्श। उसकी आंखों में डर और आश्चर्य दोनों थे। उसे पीछे के रास्ते हॉल के एक कोने में ले जाया गया। वहां मेहमानों के लिए तरह-तरह के पकवान रखे थे। खाने की खुशबू ने चुटकी को पागल कर दिया। वह ऐसे खाने लगी जैसे सदियों की भूखी हो।
यशवर्धन खुद सीढ़ियों से नीचे उतर कर आए। उन्होंने उस बच्ची को देखा—कीचड़ में सने पैर, गीले बाल, बड़ी-बड़ी डरी हुई आंखें। यशवर्धन ने रामू काका से कहा, “इसे भरपेट खाना खिलाओ और जाने से पहले कुछ सूखे कपड़े और पैसे भी दे देना।” चुटकी के खाने के अंदाज में उन्हें कुछ जाना-पहचाना सा लग रहा था। एक अजीब सी कसक थी जो उसे उसकी ओर खींच रही थी।
खाना खाते-खाते चुटकी की नजर अचानक सामने वाली दीवार पर गई। वहां सुमन की विशाल तस्वीर लगी थी, जिसमें सुमन मुस्कुरा रही थी और उनकी गोद में एक नन्ही सी बच्ची थी। चुटकी के हाथ से प्लेट छूट गई। छनन! प्लेट गिरने की आवाज से पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। रंजीत और बाकी मेहमान जो अब तक उस भिखारी लड़की को अनदेखा कर रहे थे, सब उसकी तरफ देखने लगे।
रंजीत चिल्लाया, “ए लड़की, क्या किया तूने? हजारों की क्रॉकरी तोड़ दी। इसे अभी बाहर निकालो।” लेकिन चुटकी ने किसी की बात नहीं सुनी। वो अपनी जगह से उठी और मंत्रमुग्ध सी उस तस्वीर की तरफ बढ़ी। उसके गंदे हाथ उस तस्वीर को छूने के लिए उठे, लेकिन वो रुक गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
यशवर्धन ने पूछा, “क्या हुआ? तुम उस तस्वीर को ऐसे क्यों देख रही हो?” चुटकी की आवाज कांप रही थी। उसने यशवर्धन की तरफ देखा और ऐसा सवाल किया जिसने वहां मौजूद हर शख्स के रोंगटे खड़े कर दिए, “यह मेरी मां की फोटो आपके घर में क्यों है?”
एक पल के लिए ऐसा लगा जैसे वक्त रुक गया हो। हॉल में सुई गिरने की भी आवाज सुनी जा सकती थी। यशवर्धन का चेहरा गुस्से और हैरानी से लाल हो गया, “क्या बकवास कर रही हो? यह मेरी पत्नी सुमन है। तुम एक भिखारी हो और यह शहर की रानी थी।” रंजीत बीच में कूद पड़ा, “देखा भाई साहब, मैं कहता था ना, यह सड़क छाप लोग भरोसे के लायक नहीं होते। यह जरूर कोई चाल है पैसे एंटने की।”
रंजीत ने चुटकी का हाथ मरोड़ दिया। चुटकी दर्द से कराह उठी, “नहीं अंकल, मैं सच बोल रही हूं। यह मेरी मां है। सुमी मां।”
सच की निशानी
यह शब्द सुनते ही यशवर्धन को जैसे करंट लगा। सुमन को घर में सब सुमन कहते थे, लेकिन यशवर्धन प्यार से उसे ‘सुमी’ बुलाते थे। यह बात बहुत कम लोग जानते थे। यशवर्धन ने रंजीत को रोका, “रुको रंजीत, उसका हाथ छोड़ो।” वे घुटनों के बल बैठकर चुटकी के बराबर आए। उनकी आंखों में अब गुस्सा नहीं, एक अजीब सी घबराहट थी। “तुमने क्या कहा? सुमी मां। तुम्हें यह नाम किसने बताया?”
चुटकी रोते हुए बोली, “मुझे नहीं पता साहब। मुझे बस इतना याद है, एक बहुत जोर की आवाज, ठंडा पानी, और फिर मैं मां से बिछड़ गई। मेरे पास मां की निशानी है। मैं रोज रात को उसे देखकर ही सोती हूं।”
यशवर्धन का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। आवाज, पानी—यह सब उस एक्सीडेंट की तरफ इशारा कर रहे थे। उनकी कार नदी में गिरी थी। “कैसी निशानी? दिखाओ मुझे।”
चुटकी ने अपनी फटी हुई फ्रॉक की अंदरूनी जेब में हाथ डाला। उसने एक बहुत पुरानी मैली कुचैली छोटी सी पोटली निकाली। उसके अंदर एक सोने का लॉकेट था—आधा टूटा हुआ—and एक तस्वीर का आधा हिस्सा। चुटकी ने वो लॉकेट और तस्वीर यशवर्धन के हाथ में रख दी।
जैसे ही यशवर्धन ने उस लॉकेट को देखा, उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। वह वहीं जमीन पर गिर पड़े। वो लॉकेट कोई साधारण लॉकेट नहीं था। वह यशवर्धन ने सुमन को उनकी पहली सालगिरह पर दिया था। यह दिल के आकार का लॉकेट था, जो बीच से खुलता था। उसके अंदर सुमन और यशवर्धन की फोटो थी। और जो तस्वीर का टुकड़ा चुटकी के पास था, वो उसी स्टूडियो वाली फोटो का आधा हिस्सा था, जो दीवार पर टंगी थी।
यशवर्धन के हाथ कांप रहे थे। उन्होंने अपनी जेब से अपना बटुआ निकाला। उसमें उस लॉकेट का दूसरा हिस्सा था, जो सुमन की लाश के पास मिला था। उन्होंने दोनों हिस्सों को जोड़ा। वे बिल्कुल फिट हो गए। हॉल में मौजूद हर इंसान की सांसे अटकी हुई थी। यशवर्धन ने भीगी आंखों से चुटकी को देखा। अब उन्हें उस मैल और कीचड़ के पीछे अपनी बेटी परी का चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। वही आंखें, वही नाक, वही माथा।
यशवर्धन चीखे, “परी! मेरी परी!” वह चुटकी को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगे। एक पिता जिसे दस साल से अपनी बेटी के मरने का गम था, आज उसे अपनी बेटी एक भिखारी के रूप में वापस मिली थी।
रंजीत का सच और नियति का खेल
लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। असली सच सामने आना बाकी था। रंजीत जो यह सब देख रहा था, उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उसे लगा कि उसके हाथों से करोड़ों की जायदाद फिसल रही है। उसने आखिरी दांव खेला, “भाई साहब, आप भावुक हो रहे हैं। यह लॉकेट, यह इसने कहीं से चुराया होगा। सुमन भाभी का लॉकेट एक्सीडेंट वाली जगह पर गिर गया होगा। यह लड़की ढोंगी है। यह परी नहीं हो सकती। परी मर चुकी है।”
यशवर्धन ने सिर उठाया। उनकी आंखों में अब आंसू नहीं, आग थी। “लॉकेट चुरा सकती है, तस्वीर चुरा सकती है। लेकिन ‘सुमी मां’ नाम और वह एक्सीडेंट की याद, पानी, ये सब कोई नहीं जान सकता।”
तभी भीड़ को चीरते हुए एक बूढ़ा आदमी आगे आया—रामू काका। उनकी आंखों में भी आंसू थे। “मालिक, रंजीत बाबू झूठ बोल रहे हैं।” सब रामू काका की तरफ मुड़े। रंजीत ने आंखें दिखाई, “ए बुड्ढे, चुप रह।” लेकिन रामू काका आज चुप नहीं रहने वाले थे।
उन्होंने कहा, “मालिक, मुझे आज सच बोलने दीजिए। दस साल पहले उस एक्सीडेंट के बाद पुलिस ने कहा था कि भाभी जी की लाश मिली लेकिन बच्ची की लाश नहीं मिली। पानी के बहाव में बह गई होगी। लेकिन एक्सीडेंट वाली रात रंजीत बाबू घर देर से आए थे और मैंने इनके जूतों पर नदी की गीली मिट्टी देखी थी और इनके हाथ में एक बच्चे का खिलौना था जो परी बिटिया का था। मैंने जब पूछा तो इन्होंने मुझे धमका दिया था।”
यशवर्धन ने रंजीत का कॉलर पकड़ लिया, “रंजीत, सच बोल! क्या हुआ था उस रात? मेरी बेटी जिंदा थी?” रंजीत घबरा गया, पसीना-पसीना हो गया। “नहीं भाई साहब, यह नौकर पागल हो गया है।”
तभी पुलिस कमिश्नर जो मेहमानों में शामिल थे, आगे आए। उन्होंने रंजीत का हाथ पकड़ लिया, “मिस्टर रंजीत, कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। अगर रामू काका का बयान सही है और अगर हम डीएनए टेस्ट करवाएं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। और अगर यह बच्ची सच में परी निकली तो तुम पर अपहरण और हत्या की कोशिश का मुकदमा चलेगा।”
डीएनए टेस्ट की बात सुनते ही रंजीत टूट गया। वो जानता था कि अब वो नहीं बच पाएगा। वो यशवर्धन के पैरों में गिर पड़ा, “भाई साहब, मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे गलती हो गई। लालच ने मुझे अंधा कर दिया था।”
रंजीत ने जो सच बताया, उसने सबके होश उड़ा दिए। उसने बताया, “उस रात एक्सीडेंट के बाद सुमन भाभी की मौके पर ही मौत हो गई थी। लेकिन बच्ची परी कार से बाहर झाड़ियों में गिर गई थी। वो जिंदा थी। मैं वहां पहुंचा था। मैंने देखा परी रो रही है। मेरे मन में लालच आ गया। मुझे लगा अगर वारिस जिंदा रहा तो मुझे जायदाद नहीं मिलेगी। मैंने परी को उठाया लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई उसे मारने की। इसलिए मैंने उसे शहर से दूर एक भिखारी गिरोह के पास छोड़ दिया। मैंने सोचा था वो वहीं मरखप जाएगी। मुझे नहीं पता था कि नियति उसे वापस यहीं ले आएगी।”
यह सुनकर यशवर्धन का खून खौल उठा। उन्होंने रंजीत को एक जोरदार तमाचा मारा, “तूने मेरी फूल सी बच्ची को भिखारियों के बीच छोड़ दिया। तू इंसान नहीं जानवर है।” पुलिस ने रंजीत को गिरफ्तार कर लिया। हथकड़ियां पहनाकर उसे ले गई।
परी की वापसी और उम्मीद की सुबह
यशवर्धन ने मुड़कर छुटकी—नहीं, अपनी परी—को देखा। परी अभी भी सहमी हुई थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। यशवर्धन ने उसे अपनी गोद में उठाया, “बेटा, मैं तुम्हारा पापा हूं। तुम्हें अब कभी भीख मांगने की जरूरत नहीं है। तुम इस घर की राजकुमारी हो। तुम्हारी मां ऊपर से हमें देख रही हैं।”
यशवर्धन ने उसी वक्त नौकरों को हुक्म दिया, “जाओ, आज पूरी मुंबई में ऐलान करवा दो। मेरी बेटी मिल गई है। और आज जितने भी गरीब भिखारी इस इलाके में हैं, सबको बुलाओ। आज कोई भूखा नहीं सोएगा। आज मन्नत विला में असली मन्नत पूरी हुई है।”
परी को नहलाया गया, नए कपड़े पहनाए गए। जब वह तैयार होकर आई तो सचमुच एक परी लग रही थी। उस रात यशवर्धन ने परी को अपने हाथों से खाना खिलाया। वही जगह, वही हॉल, जहां कुछ देर पहले उसे धक्के मारे जा रहे थे, अब वह उस घर की मालकिन थी। दीवार पर लगी सुमन की तस्वीर को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी मुस्कान और भी गहरी हो गई हो।
कहानी की सीख
यह कहानी हमें सिखाती है कि कभी किसी की वेशभूषा देखकर उसकी औकात का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए। वक्त सबसे बड़ा खिलाड़ी है। जो रंजीत कल तक उस घर का वारिस बनने के सपने देख रहा था, वो आज जेल की सलाखों के पीछे है। और जो बच्ची कल तक एक रोटी के लिए तरस रही थी, वो आज करोड़ों की मालकिन है। पाप का घड़ा एक ना एक दिन भरता जरूर है और सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं।
अगर इस बाप-बेटी के मिलन ने आपकी आंखों में भी आंसू ला दिए हैं, तो इस कहानी को अपने दोस्तों और परिवार के साथ शेयर करें ताकि सबको पता चले कि इंसानियत और उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
समाप्त
जय हिंद।
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