मजदूरी करके पत्नी को डॉक्टर बनाया वही पत्नी बोली कौन हो तुम मैं नहीं जानती और फिर||

त्याग और पश्चाताप: एक म/जदू/र पति और डॉक्टर पत्नी की कहानी

यह कहानी केवल एक पति-पत्नी की नहीं है, बल्कि यह उस अटूट विश्वास और निस्वार्थ प्रेम की मिसाल है जो आज के दौर में कम ही देखने को मिलती है। यह कहानी झारखंड के एक छोटे से गाँव के रहने वाले राजू और उसकी पत्नी कोमल के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है।

राजू का सं/घ/र्ष और कोमल का छिपा हुआ सपना

राजू का बचपन अभावों में बीता था। उसके माता-पिता उसे बचपन में ही अकेला छोड़कर परलोक सिधार गए थे। उसका पालन-पोषण उसके चाचा-चाची ने किया। चाचा तो फिर भी दयालु थे, लेकिन चाची की नजरों में राजू हमेशा एक बोझ की तरह रहा। वे उसे हर बात पर ता/ने मारतीं और उसे घर के काम में जोते रखतीं। इसी वजह से राजू अपनी 12वीं के बाद की पढ़ाई जारी नहीं रख सका और कम उम्र में ही म/जदू/री करने लगा।

जब राजू थोड़ा सयाना हुआ, तो उसके चाचा ने उसकी शादी कोमल से तय कर दी। कोमल एक अत्यंत ग/री/ब परिवार से थी, लेकिन उसकी सादगी और सुंदरता ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। शादी के बाद राजू को उसके माता-पिता का पुराना खंडहर जैसा मकान दे दिया गया। कोमल ने अपनी ममता और मेहनत से उस खंडहर को एक खुशहाल घर बना दिया। राजू दिन भर काम करता और कोमल घर संभालती।

एक शाम जब राजू थका-हारा घर लौटा, तो उसने देखा कि कोमल एक कोने में बैठकर अपनी पुरानी फटी-पुरानी किताबें पढ़ रही है। राजू ने पास जाकर पूछा, “कोमल, ये क्या पढ़ रही हो?” कोमल ने झिझकते हुए किताबें छिपा लीं और कहा, “कुछ नहीं, बस पुराना शौक है।” लेकिन राजू ने उसकी आँखों में एक चमक देखी और उससे सच उगलवा लिया। कोमल ने रोते हुए कहा, “राजू, मेरा सपना डॉक्टर बनने का था। मैंने 12वीं में बहुत अच्छे अंक पाए थे, लेकिन मेरे पिता के पास कॉलेज की फीस के लिए पैसे नहीं थे।”

राजू ने कोमल का हाथ थामा और एक बड़ा संकल्प लिया। उसने कहा, “कोमल, तुम्हारा सपना अब मेरा सपना है। तुम बस पढ़ाई की तैयारी करो, चाहे मुझे रात-दिन एक करना पड़े, मैं तुम्हें डॉक्टर बनाकर ही दम लूँगा।”

पसीने से सींची गई सफलता

राजू ने अपनी म/जदू/री का समय बढ़ा दिया। वह सुबह सूरज निकलने से पहले घर से निकल जाता और रात को जब लौटता, तो उसके कपड़े मिट्टी और पसीने से लथपथ होते। कोमल की मेडिकल कोचिंग और किताबों का खर्च बहुत ज्यादा था। राजू ने गाँव के साहूकार से कर्ज लिया और खुद भूखा रहकर कोमल के लिए अच्छे नोट्स और किताबें लाता रहा।

जब कोमल रात भर जागकर पढ़ती, तो राजू उसके पास बैठा रहता। वह बार-बार कोमल के लिए चाय बनाता और उसे हिम्मत देता। कई बार ऐसा होता कि घर में केवल एक ही व्यक्ति के लायक खाना होता, तो राजू झूठ बोल देता कि उसने बाहर खा लिया है। धीरे-धीरे समय बीता और कोमल की मेहनत और राजू के त्याग ने रंग दिखाया। कोमल ने सरकारी मेडिकल कॉलेज की एमबीबीएस की परीक्षा में टॉप किया।

पूरे गाँव में ढोल-नगाड़े बजे। राजू ने उन सभी लोगों को मिठाई खिलाई जो कभी उसका मजाक उड़ाते थे। कोमल रांची के मेडिकल कॉलेज चली गई। पढ़ाई के दौरान भी राजू का सं/घ/र्ष जारी रहा। वह हर महीने अपनी पूरी कमाई कोमल को भेज देता और खुद फटे हुए जूतों में काम करता रहा। कोमल डॉक्टर बन गई और रांची के एक आलीशान प्राइवेट हॉस्पिटल में उसकी जॉइनिंग हो गई।

शहर की चकाचौंध और विश्वासघात

शहर जाने के बाद कोमल का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगा। वह अब बड़े डॉक्टरों, नर्सेज़ और रईस मरीजों के बीच रहती थी। उसे अब अपना म/जदू/र पति और उसका गाँव वाला लहजा श/र्मिंदगी भरा लगने लगा। उसने हॉस्पिटल में खुद को अविवाहित बताया था ताकि उसकी छवि एक ‘आधुनिक डॉक्टर’ की बनी रहे। वह राजू के फोन उठाना कम कर दी और कभी उठाती भी तो कहती कि वह बहुत व्यस्त है।

एक दिन, गाँव का एक बीमार व्यक्ति इलाज के लिए कोमल के हॉस्पिटल पहुँचा। उसने कोमल को देखते ही पहचान लिया और खुशी-खुशी पास जाकर बोला, “डॉक्टर साहिबा! आप तो कोमल हो ना? राजू का क्या हाल है? वह तो आपकी राह देखता रहता है।” कोमल के आसपास उसके साथी डॉक्टर खड़े थे। अपनी ‘झूठी शान’ को बचाने के लिए कोमल ने उस व्यक्ति को डांट दिया और कहा, “कैसा राजू? मैं तुम्हें नहीं जानती। लगता है तुम पागल हो गए हो, सुरक्षाकर्मी इसे बाहर निकालो!”

उस व्यक्ति ने गाँव लौटकर राजू को जब यह बताया, तो राजू के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे यकीन नहीं हुआ कि उसकी कोमल ऐसा कर सकती है।

हॉस्पिटल का अपमानजनक दृश्य

सच जानने के लिए राजू रांची पहुँचा। वह म/जदू/री के ही कपड़ों में था, चेहरे पर धूल थी और हाथ फटे हुए थे। हॉस्पिटल के गेट पर उसे वॉचमैन ने रोक लिया, “ए म/जदू/र! यहाँ कहाँ जा रहा है? भाग यहाँ से।” राजू ने अपनी जेब से मजदूरी के कुछ पैसे दिखाए और कहा, “मुझे डॉक्टर साहिबा को दिखाना है।”

जैसे ही राजू कोमल के केबिन के बाहर पहुँचा, उसने देखा कि कोमल हंस-हंसकर अपने साथी डॉक्टरों से बात कर रही है। राजू ने धीरे से पुकारा, “कोमल…”

पूरे केबिन में सन्नाटा छा गया। कोमल ने राजू की तरफ देखा, उसकी आँखों में पहचान थी लेकिन दिल में पत्थर। उसने चिल्लाकर कहा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की? कौन हो तुम? और मुझे कोमल कहने की जुर्रत कैसे की? मैं डॉक्टर निशा हूँ!” राजू का दिल कांच की तरह टूट गया। उसने भारी मन से कहा, “लगता है मैं ग/लत जगह आ गया हूँ। कोमल, तुम जहाँ भी रहो, खुश रहना।”

राजू जब बाहर निकल रहा था, तो एक नर्स ने उसे रोककर ता/ना मारा, “अपनी शक्ल देखी है? कहाँ वो और कहाँ तुम।” राजू ने उसे अपनी और कोमल की शादी की पुरानी तस्वीर दिखाई और कहा, “मैं उसका पति हूँ बहनजी, लेकिन शायद आज वो बहुत बड़ी हो गई है और मैं बहुत छोटा।” राजू आँखों में आँसू लिए वापस गाँव चला गया।

पश्चाताप की अग्नि और मिलन

हॉस्पिटल में वह नर्स बहुत संवेदनशील थी। उसने वह फोटो देख ली थी और जल्द ही यह खबर पूरे हॉस्पिटल में आग की तरह फैल गई कि डॉक्टर कोमल ने अपने उस पति को ठुकरा दिया है जिसकी बदौलत वह आज यहाँ है। हॉस्पिटल के सीनियर डॉक्टरों ने कोमल को धि/क्कारा। कोमल को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे वह पुरानी बातें याद आईं जब राजू पसीने से तर-बतर होकर उसे पैसे देता था और कहता था, “कोमल, तू बस पढ़, मैं हूँ ना!”

दो दिन तक कोमल सो नहीं पाई। तीसरे दिन वह अपनी महंगी गाड़ी लेकर सीधे उस कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुँची जहाँ राजू काम कर रहा था। राजू को धूल में काम करते देख कोमल की रूह कांप गई। वह गाड़ी से उतरी और दौड़कर राजू के पास गई। सबके सामने उसने राजू के पैर पकड़ लिए और फूट-फूटकर रोने लगी।

“राजू! मुझे माफ कर दो। मैं शहर की चकाचौंध में अपनी असलियत भूल गई थी। मैं गुनहगार हूँ तुम्हारी।” कोमल की आँखों से बहते आँसू उसके पश्चाताप की गवाही दे रहे थे। राजू ने कोमल को उठाया और कहा, “कोमल, मैंने कभी तुमसे नफरत की ही नहीं। मैं तो बस ये चाहता था कि तुम जहाँ रहो, सम्मान से रहो।”

वहाँ खड़े अन्य म/जदू/र हैरान थे कि इतनी बड़ी डॉक्टर उनके साथी राजू से माफी क्यों मांग रही है। राजू और कोमल का फिर से मिलन हुआ। कोमल ने राजू को म/जदू/री करना छुड़वा दिया। आज वे शहर में एक साथ रहते हैं। कोमल का अपना क्लिनिक है और राजू उस क्लिनिक का प्रबंधन देखता है। वे अब गाँव के ग/री/ब बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उठाते हैं ताकि कोई और राजू या कोमल अपनी परिस्थितियों की वजह से पीछे न रह जाए।

निष्कर्ष: यह कहानी हमें याद दिलाती है कि रिश्ते कभी भी ओहदे से बड़े या छोटे नहीं होते। सफलता के शिखर पर पहुँचकर उन जड़ों को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने आपको बढ़ने के लिए पोषण दिया।

जय हिंद।