दूध चाहिए तो मुझसे शादी करो | घमंडी लड़की ने रखी यह कैसी शर्त? | मजबूर पिता का दर्द

मंदिर की सीढ़ियों पर बंधी किस्मत
एक सुनसान मंदिर था, चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था। मंदिर की सीढ़ियों पर एक आदमी बैठा था—अजय। उसकी गोद में उसकी दो साल की बेटी पीहू थी, जो भूख से तड़प रही थी। “पापा, दूध…” पीहू ने मुँह से सूखे होठों पर उंगलियां फेरते हुए कहा। अजय के पास न पैसे थे, न कोई सहारा। जेब खाली, पेट खाली और दिमाग में बस एक सवाल—अब कहाँ जाऊं?
उसने आसमान की ओर देखा। आंखों से आंसू बह निकले। “भगवान, तू तो सबका रखवाला है ना। इस छोटी सी जान पर तरस खा ले।” उसी पल दूर से हेडलाइट्स की चमक पड़ी। एक कार मंदिर के सामने आकर रुकी। दरवाजा खुला और बाहर उतरी एक लड़की—रिया। महंगे कपड़े, हाथ में एक दूध की बोतल और चेहरे पर थकान का साया। वह शायद किसी परेशानी से भागी लग रही थी।
रिया मंदिर की सीढ़ियां चढ़कर अंदर चली गई। अजय की नजर उस दूध की बोतल पर अटक गई। खुद से लड़ते हुए वह उठा और डरते-डरते बोला, “सुनिए, क्या आप यह दूध मुझे दे सकती हैं? मेरी बेटी भूखी है।” रिया पलटी, उसकी नजर अजय के फटे कपड़ों और पीहू के सूखे होठों पर पड़ी। वह कुछ पल उसे देखती रही, फिर ठंडी आवाज में बोली, “क्यों दूं? मेरे पास बस एक ही बोतल है। यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, मेरी नहीं।”
अजय ने विनम्रता से कहा, “मुझे आपकी मुश्किल का अंदाजा नहीं, पर मेरी बच्ची की सांसें टूट रही हैं। थोड़ा सा दे दीजिए, भगवान आपका भला करेगा।” रिया हल्का व्यंग्य करते हुए हंसी, “तुम्हें लगता है भगवान किसी के कहने से कुछ देता है?” अजय की आंखें भर आईं, “शायद आप सही कह रही हैं। लेकिन इस वक्त मुझे बस अपनी बेटी को जिंदा रखना है।”
रिया उसके पास आई, थोड़ा झुक कर बोली, “ठीक है, दूंगी दूध। लेकिन एक शर्त पर।” अजय ने कांपते हुए पूछा, “कैसी शर्त?” रिया बोली, “शादी करोगे मुझसे?” अजय हक्का-बक्का रह गया। “क्या कहा तुमने? क्या मजाक है यह? मैं एक गरीब आदमी हूं और तुम…” रिया ने उसकी बात काट दी, “मजाक नहीं कर रही। मुझे आज किसी से शादी करनी है। वरना घर वाले मेरी जिंदगी नर्क बना देंगे। और तुम मुझे मिले हो। बस यही किस्मत है।”
अजय गुस्से और हैरानी से बोला, “तुम्हें लगता है शादी खिलौना है? क्यों किसी मजबूर की मजबूरी से खेल रही हो?” रिया ने ठंडी हंसी हंसी, “तुम चाहो तो मना कर सकते हो। बस ध्यान रहे, तुम्हारी बेटी सुबह तक शायद जिंदा ना रहे।” अजय की सांसें थम गईं। उसने पीहू को देखा—आंखें बंद, सांस धीमी। उस पल उसे लगा जैसे भगवान ने कोई खेल रच दिया हो। उसने आंखें बंद की और बुदबुदाया, “अगर यही तेरी मर्जी है प्रभु, तो मंजूर है।”
मंदिर के सामने दोनों खामोश खड़े रहे। ना कोई गवाह, ना कोई मंत्र। बस भगवान के सामने दो अजनबी, जो अब एक बंधन में बंधने वाले थे। रिया ने दूध की बोतल उसकी ओर बढ़ाई, “अब यह तुम्हारा हक है, भीख नहीं।” अजय ने बोतल ली, पीहू के होठों पर दूध लगाया। बच्ची मुस्कुराई और उसी मुस्कान ने अजय की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया।
रिया की सच्चाई
रिया अपने परिवार की इकलौती संतान थी। उसकी दुनिया मीटिंग्स, कॉन्ट्रैक्ट्स और फैसलों में उलझी रहती। घरवाले चाहते थे कि वह शादी कर ले, पर रिया का ध्यान हमेशा काम पर ही लगा रहता। उसी दिन रिया किसी बड़ी बिजनेस मीटिंग से लौट रही थी। फोन पर पिता ने कहा, “अगर तुम आज शादी नहीं करोगी तो परिवार की दौलत दान कर देंगे। तुम्हारे बिना हमारा नाम धूमिल हो जाएगा।”
इसी राह में एक आदमी और उसकी बच्ची उससे लिफ्ट की गुजारिश कर बैठे। बच्चे की शोरशराबे में एक दूध की बोतल रह गई। रिया ने वह बोतल अपने हाथ में उठा ली। बोतल को देखकर कुछ अटक सा गया। शायद यही बुदबुदाहट थी जिसने उसे मंदिर की ओर मोड़ा।
शहर का सफर और नया रिश्ता
रिया ने अजय और पीहू को अपने घर ले जाने का फैसला किया। उसका घर किसी महल से कम नहीं था। नौकरों की भीड़, बड़ी गैलरी, ऊंची दीवारें। रिया ने सबके सामने ऐलान किया, “मैंने शादी कर ली है और यह हैं मेरे पति अजय।” पूरा घर ठिठक गया। मां की आंखों में हैरानी थी, पिता का चेहरा गुस्से से लाल।
रात को रिया अजय के कमरे में आई, “देखो अजय, यह सब बस दिखावे के लिए था। मेरे घर वाले मुझे मजबूर कर रहे थे, इसलिए मैंने यह किया। तुम मेरे जीवन में बस एक नाम हो, इससे ज्यादा कुछ नहीं।” अजय ने शांत स्वर में कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए रिया। मैं तो बस अपनी बेटी को जिंदा रखना चाहता था। मैं हर इंसल्ट सह लूंगा, बस उसे किसी चीज की कमी ना हो।”
धीरे-धीरे बदलती जिंदगी
दिन बीतते गए। रिया अपने बिजनेस में लगी रही और अजय घर के काम करता, पीहू का ध्यान रखता। धीरे-धीरे नौकरों में बातें फैलने लगीं—वह छोटी सी बच्ची कितनी प्यारी है। रिया इन बातों को नजरअंदाज करती रही। पर जब भी वह देखती कि पीहू अजय की उंगली पकड़ कर चल रही है या उसकी नाक पकड़ कर हंस रही है, उसके अंदर कुछ टूट सा जाता था।
एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त रिया का मूड बहुत खराब था। कंपनी में बड़ा नुकसान हुआ था। घर पहुंची तो देखा लॉन में पीहू मिट्टी में खेल रही थी। रिया चीखी, “अजय, क्या यही सिखा रहे हो अपनी बेटी को? मेरे घर को गंदा कर दिया तुमने।” पीहू डर के मारे रोने लगी। अजय ने कहा, “रिया, बच्ची है, बस खेल रही थी।” रिया ने झल्लाकर कहा, “यह तुम्हारा घर नहीं है अजय, और यह बच्ची…” वो रुकी, पीहू की आंखों में डर देखकर, “…इसे मेरे घर की आदत मत डालो।”
रात को रिया बालकनी में खड़ी थी। नीचे से धीमे रोने की आवाज आई। वह झांक कर देखती है तो अजय अपनी गोद में पीहू को लिए बैठा है और धीरे-धीरे उसे चुप करा रहा है। “रो मत बिटिया, कल फिर खेलना। पर धीरे से।” रिया के दिल में कुछ पिघला। पहली बार उसने महसूस किया कि अजय की गरीबी में भी कितना अपनापन था और उसकी अपनी दौलत में कितना खालीपन।
ममता की जीत
अगली सुबह जब रिया नीचे आई तो देखा पीहू ने उसके लिए दूध का गिलास रखा है और बोली, “मम्मा, गुड मॉर्निंग!” रिया चौकी, पीहू मुस्कुरा रही थी। दांतों में टूथपेस्ट लगा हुआ, बाल उलझे हुए, पर आंखों में इतनी सच्चाई थी कि रिया चाहकर भी कुछ नहीं कह सकी। बस उसने हल्के से मुस्कुरा कर कहा, “गुड मॉर्निंग।”
अब यह घर सिर्फ दीवारों का नहीं, एक रिश्ते का घर बनने लगा था। दिन बीतते गए। रिया की जिंदगी जो अब तक सिर्फ काम, मीटिंग और सेल्फ रिस्पेक्ट के इर्द-गिर्द घूमती थी, उसमें एक नन्हा सा चेहरा जगह बनाने लगा—पीहू। उसकी मासूम हंसी, छोटे-छोटे हाथों से रिया की साड़ी खींचना, “मम्मा देखो” कहते हुए कूदना। धीरे-धीरे रिया के दिल की दीवारें दरकने लगीं।
एक सुबह रिया किचन में कॉफी बना रही थी। पीहू आई, “मम्मा, आज मैं आपको कॉफी बनाकर दूं?” रिया मुस्कुराई, “तुम्हें आती है?” पीहू ने मासूमियत से कहा, “पापा कहते हैं कोशिश करने से सब आता है।” रिया एक पल के लिए रुक गई। “पापा” उस शब्द में अब मिठास थी। पीहू ने गिलास में दूध डाला, कॉफी गिरा दी, पूरा स्लैब गंदा हो गया। रिया गुस्सा करने वाली थी, पर पीहू के चेहरे पर डर देखकर उसने खुद को रोक लिया। “कोई बात नहीं, आओ साथ में साफ करते हैं।” पीहू खिलखिलाकर बोली, “मम्मा, आप तो बिल्कुल परी जैसी हो।” रिया की आंखें भर आईं।
अटूट रिश्ता
अब रिया अक्सर घर जल्दी लौटने लगी। कभी पीहू को कहानियां सुनाती, कभी उसके बालों में तेल लगाती। अजय दूर से यह सब देखता और उसकी आंखों में कृतज्ञता झलकती। एक रात हल्की बारिश हो रही थी, बिजली चली गई थी। रिया बालकनी में बैठी थी, पीहू उसकी गोद में सो रही थी। अजय धीरे से आया, “रिया… धन्यवाद।” रिया ने हैरान होकर पूछा, “किस बात का?” “उसकी मां बनने के लिए।” अजय की आवाज कांप रही थी।
रिया कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, “पता है अजय, जब मैंने उस मंदिर में तुमसे शादी की थी, मैंने सोचा था मैं बस अपने परिवार को सबक सिखा रही हूं। लेकिन शायद भगवान मुझे सबक सिखाना चाहते थे।” अजय ने उसकी तरफ देखा, उसकी आंखों में पहली बार प्यार नहीं, सम्मान था। रिया ने पीहू के बालों को सहलाते हुए कहा, “अब यह सिर्फ तुम्हारी नहीं, मेरी भी बेटी है।”
अजय मुस्कुराया, “वह तो उस दिन से तुम्हारी थी, जिस दिन उसने पहली बार तुम्हें मम्मा कहा था।” बारिश की बूंदें खिड़की से अंदर आ रही थीं, कमरे में पीहू की नींद भरी सांसे गूंज रही थीं और उन तीनों के बीच एक अटूट रिश्ता बन चुका था। रिया का दिल अब पत्थर नहीं रहा, वह ममता से भर गया था। जिसे कभी उसने कमजोरी कहा था, अब वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बन चुकी थी।
समाप्ति
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